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Author: Yogacharya Dhakaram

Yogacharya Dhakaram, a beacon of yogic wisdom and well-being, invites you to explore the transformative power of yoga, nurturing body, mind, and spirit. His compassionate approach and holistic teachings guide you on a journey towards health and inner peace.

चक्रासन: विधि, लाभ, सावधानियाँ और सही अभ्यास

चक्रासन क्या है?

चक्रासन योग का एक अत्यंत महत्वपूर्ण आसन है, जिसमें शरीर को पीछे की ओर मोड़कर पहिए जैसा आकार बनाया जाता है। इसलिए इसे चक्रासन कहा जाता है। अंग्रेज़ी में इसे Wheel Pose भी कहते हैं। यह आसन शरीर को लचीलापन, शक्ति और ऊर्जा प्रदान करने वाला माना जाता है।

परंपरागत योग ग्रंथों में चक्रासन का विशेष महत्व बताया गया है। इसे ऊर्ध्व धनुरासन के नाम से भी जाना जाता है, और गुरुजी बी.के.एस. अयंगर की योग परंपरा में भी यही नाम प्रचलित है। हठयोग के प्रमुख ग्रंथ हठ रत्नावली (Hatha Ratnavali), जिसकी रचना श्रीनिवास योगी ने की मानी जाती है, उसमें भी चक्रासन का उल्लेख मिलता है। इस ग्रंथ में इसे भगवान शिव द्वारा बताए गए 84 प्रमुख आसनों में से एक महत्वपूर्ण आसन माना गया है, जो शरीर की लचीलापन और शक्ति को बढ़ाने में सहायक है।

चक्रासन का महत्व

चक्रासन केवल एक शारीरिक अभ्यास नहीं, बल्कि संपूर्ण शरीर को सक्रिय करने वाला आसन है। यह रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाता है, छाती को खोलता है, और शरीर में नई ऊर्जा का संचार करता है। नियमित अभ्यास से व्यक्ति अधिक चुस्त, स्फूर्तिवान और आत्मविश्वासी महसूस करता है।

चक्रासन करने की विधि

चक्रासन करने के लिए योगा मैट, दरी या कंबल पर सावधानीपूर्वक अभ्यास करें।

  1. सबसे पहले शवासन की स्थिति में पीठ के बल लेट जाएँ।
  2. दोनों घुटनों को मोड़ें और एड़ियों को नितंबों के पास रखें।
  3. दोनों पैरों के बीच लगभग कंधों जितना फासला रखें।
  4. अब धीरे-धीरे दोनों हाथों को उठाकर सिर के ऊपर ले जाएँ।
  5. कोहनियों को मोड़कर दोनों हथेलियों को कंधों के पास, जमीन पर रखें।
  6. श्वास भरते हुए हथेलियों और पैरों पर दबाव दें और धीरे-धीरे कंधों, छाती और फिर कमर को ऊपर उठाएँ।
  7. अपनी क्षमता के अनुसार शरीर को ऊपर की ओर ले जाएँ।
  8. धीरे-धीरे घुटनों को सीधा करने का प्रयास करें और छाती को पूरी तरह खोलें।
  9. इस अवस्था में 15 से 20 सेकंड तक रहें। श्वास सामान्य रखें।
  10. जब शरीर अभ्यस्त हो जाए, तो समय बढ़ाकर 1 से 2 मिनट तक स्थिर रहने का अभ्यास कर सकते हैं।
  11. आसन से बाहर आते समय उसी क्रम के विपरीत धीरे-धीरे वापस आएँ।
  12. पहले सिर और कंधों को जमीन पर रखें, फिर कमर और नितंबों को नीचे लाएँ।
  13. हाथों को धीरे-धीरे ऊपर उठाकर बगल में ले आएँ और पैरों को सीधा करें।
  14. अंत में शवासन में विश्राम करें और कम से कम 1 मिनट तक शरीर और श्वास का अवलोकन करें।

चक्रासन के लाभ

चक्रासन के नियमित अभ्यास से अनेक लाभ मिलते हैं:

  • मेरुदंड लचीला और मजबूत बनता है
  • पूरे शरीर में चुस्ती और स्फूर्ति आती है
  • कंधे और कलाइयाँ मजबूत होती हैं
  • शोल्डर ब्लेड और पीठ की मांसपेशियाँ सुदृढ़ होती हैं
  • हृदय और फेफड़ों के लिए यह बहुत लाभकारी माना जाता है
  • छाती का विस्तार होता है और श्वास-प्रश्वास बेहतर होता है
  • शरीर में ऊर्जा, उत्साह और सकारात्मकता बढ़ती है

सावधानियाँ

चक्रासन करते समय विशेष सावधानी रखना बहुत ज़रूरी है। निम्न स्थितियों में यह आसन नहीं करना चाहिए:

  • जिनकी कमर में दर्द हो
  • प्रेगनेंसी के दौरान
  • मासिक धर्म के समय
  • Frozen Shoulder की समस्या हो
  • जिनको कंधे, गर्दन या पीठ में गंभीर चोट/समस्या हो

यदि शरीर में किसी प्रकार की असुविधा हो, तो अभ्यास तुरंत रोक देना चाहिए।

एक महत्वपूर्ण बात

जब भी आप चक्रासन या किसी भी पीछे झुकने वाले आसन का अभ्यास करें, तो ध्यान रखें कि झुकाव कमर से नहीं, बल्कि छाती के विस्तार से होना चाहिए। पीछे झुकने का अर्थ केवल कमर पर दबाव डालना नहीं है। छाती को अधिक से अधिक खोलना चाहिए, ताकि कमर पर अनावश्यक दबाव न पड़े। गलत तरीके से करने पर नुकसान भी हो सकता है।

चक्रासन एक अत्यंत प्रभावशाली योगासन है, जो शरीर, श्वास और मन—तीनों को सक्रिय करता है। सही विधि, संयम और सावधानी के साथ इसका अभ्यास करने पर यह शरीर को लचीलापन, शक्ति और नई ऊर्जा प्रदान करता है। नियमित अभ्यास से जीवन में संतुलन, प्रसन्नता और स्वास्थ्य का अनुभव होता है।

योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक, योगापीस संस्थान

अपने नितंबों को कैसे लचीला बनाएं

हरि ओम। प्यारे मित्रों, आप सभी को हमारा सादर नमस्कार।
“एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर” कार्यक्रम में आप सभी का हार्दिक स्वागत है। आशा है आप सभी स्वस्थ, मस्त और आनंदित होंगे।

आज हम पद्मासन की चर्चा करेंगे। लगभग हर साधक की यह इच्छा होती है कि वह सहजता से पद्मासन में बैठ सके। पद्मासन लगाने के लिए सबसे पहले जोड़ों की तैयारी आवश्यक है—विशेष रूप से नितंब (हिप) के जोड़ और टखनों के जोड़। जब ये जोड़ खुले और लचीले होते हैं, तभी पद्मासन सहज बनता है।

पद्मासन का संक्षिप्त परिचय

पद्मासन लगाने के लिए दंडासन में बैठें।
दाएँ घुटने को मोड़ते हुए दाएँ पैर का पंजा बाईं जांघ पर रखें।
अब बाएँ घुटने को मोड़ते हुए बाएँ पैर का पंजा दाईं जांघ पर रखें।
इसी स्थिति को पद्मासन कहा जाता है।

नितंब (हिप) जोड़ को लचीला बनाने की पहली क्रिया

  1. दंडासन में बैठ जाएँ।
  2. दाएँ घुटने को मोड़कर दाएँ पैर का पंजा बाईं जांघ पर रखें।
  3. दाएँ हाथ से दाएँ घुटने के ठीक नीचे सहारा दें।
  4. बाएँ हाथ से दाएँ पैर के टखने और एड़ी को पकड़ें।
  5. अब दाएँ घुटने को पहले दाईं ओर पीछे की तरफ ले जाएँ।
  6. फिर दाएँ घुटने को बाईं ओर पीछे की तरफ ले जाएँ।
  7. अपनी क्षमता अनुसार यह क्रिया करें।
  8. तीन बार दाईं ओर और तीन बार बाईं ओर करें।

अब यही प्रक्रिया बाएँ पैर से दोहराएँ—
बाएँ पैर का पंजा दाईं जांघ पर रखें, बाएँ हाथ से घुटना और दाएँ हाथ से टखना-एड़ी पकड़ें।
घुटने को पहले बाईं ओर, फिर दाईं ओर पीछे की तरफ ले जाएँ।
जितनी बार दाएँ पैर से किया, उतनी ही बार बाएँ पैर से करें।

नितंब और घुटनों के लिए दूसरी क्रिया

  1. दाएँ पैर की एड़ी नाभि के पास रखें।
  2. दोनों हाथों से दाएँ घुटने को पकड़कर छाती से लगाने का प्रयास करें।
  3. 10–15 सेकंड छाती की ओर रोकें।
  4. फिर घुटने को पकड़कर ज़मीन की ओर लगाने का प्रयास करें और 10–15 सेकंड रोकें।
  5. इस क्रिया को तीन बार ऊपर और तीन बार नीचे करें।

अब यही प्रक्रिया बाएँ घुटने से करें—
जितनी बार दाएँ घुटने से किया है, उतनी ही बार बाएँ घुटने से दोहराएँ।

अभ्यास करते समय महत्वपूर्ण सुझाव

कई लोग इन क्रियाओं को तेज़ी से करते हैं। तेज़ करने पर क्षणिक रूप से लाभ लगता है, लेकिन धीरे, सजगता और नियंत्रण के साथ करने पर ही योगिक क्रियाओं का पूर्ण लाभ मिलता है।
इन अभ्यासों से:

  • घुटनों में लचीलापन आता है
  • कूल्हे के जोड़ में चिकनापन बढ़ता है
  • पद्मासन सहज और स्थिर होने लगता है

लाभ

  • पद्मासन लगाने से शरीर सीधा और संतुलित होता है।
  • छाती खुलती है और श्वसन बेहतर होता है।

सावधानी

  • सभी योगिक क्रियाएँ धीरे-धीरे, ध्यानपूर्वक और अपनी क्षमता अनुसार ही करें।

समापन

इसी के साथ आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद और आभार।
आप सभी खुश रहें, मस्त रहें और आनंदित रहें।

— योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक, योगापीस संस्थान

चमकती त्वचा के लिए सबसे बेहतरीन योग: सिंहासन

हरि ओम, आप सभी को मुस्कुराता हुआ नमस्कार! “एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर” कार्यक्रम में आप सभी का हृदय से स्वागत। खुशियों की इसी कड़ी में आज हम एक बहुत ही विशेष विषय पर बात करेंगे—’खूबसूरती के लिए योग‘।

मेरा मानना है कि योग और सुंदरता एक-दूसरे के पूरक हैं। जब आप योग के माध्यम से भीतर से आनंदित होते हैं, तो वह प्राकृतिक चमक आपके चेहरे पर अपने आप छलकने लगती है। आज हम एक ऐसे आसन की चर्चा करेंगे जो आपके चेहरे की आभा को कई गुना बढ़ा देगा, और वह है—सिंहासन।

प्राकृतिक सुंदरता बनाम कृत्रिम उपचार

अक्सर लोग चमकती त्वचा के लिए ब्यूटी पार्लर का सहारा लेते हैं, लेकिन यदि आप सिंहासन का नियमित अभ्यास करते हैं, तो आपको इनकी आवश्यकता नहीं पड़ेगी। आइए समझते हैं कि क्यों सिंहासन कृत्रिम सौंदर्य उपचारों से कहीं बेहतर है:

  • जहाँ ब्यूटी पार्लर के उपचार महंगे होते हैं, वहीं सिंहासन पूरी तरह से निःशुल्क है और जीवनभर लाभ देता है।
  • कृत्रिम उपचार केवल त्वचा की बाहरी सतह पर काम करते हैं, जबकि सिंहासन मांसपेशियों को भीतर से सक्रिय कर रक्त संचार बढ़ाता है।
  • पार्लर के उपचार केवल त्वचा तक सीमित हैं, जबकि सिंहासन से थायराइड, फेफड़ों और हृदय को भी मजबूती मिलती है।
  • रासायनिक उपचारों का असर कुछ दिनों में खत्म हो जाता है, जबकि योग के परिणाम स्थायी और दीर्घकालिक होते हैं।
  • ब्यूटी उत्पादों के रसायनों से एलर्जी का डर रहता है, लेकिन सिंहासन पूरी तरह प्राकृतिक और सुरक्षित है।
  • सिंहासन केवल सुंदरता ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य का भी खजाना है:
  • ग्रंथि स्वास्थ्य: यह गले की ग्रंथियों, जैसे थायराइड और पैराथायराइड के लिए रामबाण है।
  • फेफड़े और हृदय: दहाड़ते समय जब हम पूरी श्वास बाहर निकालते हैं, तो फेफड़े खाली हो जाते हैं और दोबारा ताजी ऑक्सीजन मिलने से हृदय को नई शक्ति मिलती है।
  • चेहरे की चमक: यह चेहरे की सभी मांसपेशियों (गाल, आंखें, ठुड्डी) का व्यायाम कर उन्हें टोन करता है।
  • वाणी शुद्धि: हकलाने या आवाज की समस्या वाले लोगों के लिए यह बहुत लाभकारी है।

सिंहासन करने की सरल विधि

आप इसे अपनी क्षमतानुसार जमीन पर, कुर्सी पर या बिस्तर पर बैठकर भी कर सकते हैं:

  • सबसे पहले अपने दोनों हाथों और घुटनों के बल आएं, जैसे एक शेर खड़ा होता है।
  • गहरा श्वास लेते हुए शरीर को थोड़ा पीछे की ओर ले जाएं।
  • अपनी जीभ को पूरी तरह बाहर निकाल कर श्वास छोड़ते हुए शरीर को आगे की ओर लाएं, सीना तानें, मुंह पूरा खोलें और अपनी जीभ को ठुड्डी की तरफ पूरी बाहर निकालें।
  • अपनी आंखों को दोनों भौहों के बीच (भ्रूमध्य) केंद्रित करें, जहाँ हम तिलक लगाते हैं।
  • गले से एक शेर की तरह गरजने वाली आवाज निकालें जब तक कि पूरी श्वास खत्म न हो जाए। उसके बाद धीरे से जीभ को अंदर लेकर विश्राम करेंगे
  • इसके बाद धीरे से बैठ जाएं और आंखें बंद कर लें।

आसन के बाद सबसे महत्वपूर्ण है ‘अवलोकन’। शांत बैठकर महसूस करें कि आपके चेहरे और गले में क्या संवेदनाएं हो रही हैं। यही सूक्ष्म ध्यान (Meditation) है। इसे रोज 3 से 5 मिनट तक करें।

मेरा आप सभी से निवेदन है कि आप स्वयं इसका अनुभव करें और अपनी प्राकृतिक खूबसूरती को निखारें। यदि आपको यह जानकारी अच्छी लगे, तो इसे सबके साथ साझा करें ताकि हर कोई योग का लाभ उठा सके।

आप सभी खुश रहें, स्वस्थ रहें और परमात्मा की कृपा आप पर बनी रहे।

हरि ओम!

योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक, योगापीस संस्थान

घुटनों में दर्द होने पर वज्रासन कैसे करें – आसान विधि व लाभ

प्यारे मित्रों,
आप सभी को हमारा मुस्कुराता हुआ नमस्कार।

“एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर” लेख-श्रृंखला में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।

आज का विषय है — घुटनों में दर्द होने पर वज्रासन कैसे करें
पिछले भाग में हमने जाना कि वज्रासन हमारे पाचन तंत्र को मजबूत करता है।
आज हम समझेंगे कि यह आसन पाचन को कैसे सशक्त बनाता है और यदि किसी को घुटनों में दर्द है, तो वह प्रॉप्स (सहायक वस्तुओं) की सहायता से वज्रासन को सुरक्षित व आरामदायक रूप से कैसे कर सकता है।

वज्रासन पाचन तंत्र को कैसे मजबूत करता है

ऐसा कहा गया है कि हमारे नितंबों के ऊपर वज्र नाड़ी स्थित होती है।
जब हम वज्रासन में बैठते हैं, तो एड़ियों के दबाव से यह नाड़ी सक्रिय हो जाती है।

यह नाड़ी हमारी बड़ी आंत (Large Intestine) से जुड़ी मानी जाती है।
वज्र नाड़ी के सक्रिय होने से पाचन तंत्र में जागृति आती है और उसकी कार्यक्षमता बढ़ती है।

इसके अतिरिक्त, वज्रासन करने पर पैरों और जांघों में रक्त प्रवाह कुछ कम हो जाता है,
जिससे पेट के क्षेत्र में रक्त संचार बढ़ता है।
यही कारण है कि वज्रासन को पाचन के लिए अत्यंत लाभकारी आसन माना गया है।

घुटनों में दर्द होने पर वज्रासन कैसे करें (Using Props)

यदि आपके घुटनों में दर्द है, तो चिंता की आवश्यकता नहीं है।
आप वज्रासन को तकिया, मसनद या कंबल जैसे प्रॉप्स की सहायता से बहुत आराम से कर सकते हैं।

विधि 1: छोटे मसनद के साथ

  1. एक छोटा गोलाकार मसनद लें।
  2. वज्रासन की स्थिति में बैठें।
  3. मसनद को दोनों टखनों के नीचे रखें।
  4. कमर सीधी रखें और दोनों एड़ियाँ आपस में मिलाएँ।
  5. आँखें बंद करें और कुछ समय श्वास-प्रश्वास पर ध्यान केंद्रित करें।

विधि 2: मसनद और तकिए के साथ

  1. सबसे पहले दंडासन में बैठें।
  2. फिर धीरे-धीरे वज्रासन की स्थिति में आएँ।
  3. छोटा मसनद टखनों के नीचे रखें।
  4. पिंडलियों और जांघों के बीच एक तकिया रखें।
  5. अब अनुभव करें — घुटनों पर दबाव कम होगा और आसन अधिक आरामदायक लगेगा।

👉 यदि आपके पास मसनद उपलब्ध नहीं है, तो आप तकिया, कंबल या मुड़ी हुई बेडशीट का भी उपयोग कर सकते हैं।

वज्रासन के लाभ

• पाचन तंत्र को मजबूत बनाता है।
• अपच, गैस, एसिडिटी और पेट फूलने जैसी समस्याओं से राहत देता है।
• भोजन के बाद बैठने से भोजन को सही ढंग से पचने में सहायता मिलती है।


सावधानियाँ

• जिनके घुटनों में दर्द है, वे यह आसन प्रॉप्स की सहायता से ही करें।
• आसन में बैठते समय कमर को सीधा रखें।
• भोजन के तुरंत बाद अभ्यास करें, परंतु अधिक देर तक न बैठें।


खाना खाने के बाद कुछ समय वज्रासन में बैठना
एसिडिटी, गैस और पेट फूलने जैसी समस्याओं का एक सरल, सुरक्षित और प्राकृतिक समाधान है।

तो प्यारे मित्रों,
आप सभी को सत-सत नमन।
हमेशा खुश रहें, मस्त रहें और आनंदित रहें।

योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक – योगापीस संस्थान

सुबह के लिए सही पात्र और जल का चयन क्यों आवश्यक है

सुबह के लिए के लिए पात्र का महत्व

सुबह का पानी केवल पानी पीने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि शरीर को प्रकृति के अनुरूप संतुलित करने की एक सरल योगिक विधि है। सही पात्र और सही तापमान का पानी इसके लाभों को कई गुना बढ़ा देता है।

गर्मियों में सुबह के लिए सर्वोत्तम पानी

गर्मियों के दिनों में मटके का पानी उषा पान के लिए सबसे श्रेष्ठ माना गया है।

हमारा शरीर पाँच तत्वों — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश — से मिलकर बना है।
मटका मिट्टी (पृथ्वी तत्व) से बनता है और उसे अग्नि तत्व से पकाया जाता है।
जब उसमें पानी रखा जाता है, तो उसमें पाँचों तत्वों का संतुलित समावेश हो जाता है।
इसी कारण मटके का पानी शरीर के लिए अत्यंत लाभकारी, शीतल और पाचन-अनुकूल होता है।

सर्दियों में उषा पान के लिए उपयुक्त पात्र

सर्दियों में तांबे के बर्तन में रखा हुआ पानी उषा पान के लिए सबसे उपयुक्त होता है।

रात में तांबे के बर्तन में पानी भरकर छोड़ दें और सुबह उठकर वही पानी पिएं।
यदि आप इसका अधिक लाभ लेना चाहते हैं, तो निम्न बातों का ध्यान रखें:

  • तांबे के बर्तन को लकड़ी के पाटे पर रखें, जिससे पृथ्वी और बर्तन के बीच कुचालक का कार्य हो।
  • ऊपर से जाली लगाकर खुले स्थान में रखें, ताकि चंद्रमा की किरणें उस पर पड़ सकें।

तांबा स्वाभाविक रूप से जल को स्वच्छ, शुद्ध और ऊर्जावान बनाने की क्षमता रखता है।

यदि तांबे का बर्तन उपलब्ध न हो

यदि तांबे का बर्तन उपलब्ध न हो, तो काँच के बर्तन का उपयोग किया जा सकता है।
लेकिन प्लास्टिक की बोतल का उपयोग कभी नहीं करना चाहिए

आप स्वयं एक छोटा-सा प्रयोग कर सकते हैं—
रात में एक काँच और एक प्लास्टिक की बोतल में पानी भरकर रखें।
सुबह आप पाएँगे कि प्लास्टिक की बोतल के पानी में गंध आने लगती है, जबकि काँच का पानी शुद्ध रहता है।

गुनगुने पानी का प्रयोग — सही दृष्टिकोण

कुछ लोग मानते हैं कि उषा पान के लिए गुनगुना पानी ही लेना चाहिए।
मेरे मतानुसार, सामान्य तापमान का पानी ही सर्वोत्तम है।

गुनगुने पानी की आदत शरीर को उस पर निर्भर बना देती है,
जबकि हर परिस्थिति में गुनगुना पानी उपलब्ध नहीं हो पाता।

हाँ, सर्दी, जुकाम या खांसी की स्थिति में गुनगुने पानी का उपयोग किया जा सकता है।

उषा पान के प्रमुख लाभ

उषा पान करने से:

  • पाचन तंत्र सुदृढ़ रहता है
  • कब्ज, अत्यधिक अम्लता (एसिडिटी) और अपच में राहत मिलती है
  • पेट से संबंधित लगभग सभी समस्याओं में लाभ मिलता है

उषा पान एक सरल, प्राकृतिक और प्रभावी स्वास्थ्य साधना है।

सावधानियां

यदि आप एक बार में अधिक पानी नहीं पी सकते,
तो थोड़ी मात्रा से शुरुआत करें और धीरे-धीरे मात्रा बढ़ाएं।
शरीर की क्षमता और सहजता का ध्यान रखना आवश्यक है।

आप सभी खुश रहें, मस्त रहें और आनंदित रहें

योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक, योगापीस संस्थान

उत्कटासन – शरीर में शक्ति और संतुलन बढ़ाने वाला आसन

प्यारे मित्रों,
आप सभी को हमारा मुस्कुराता हुआ नमस्कार। एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर कार्यक्रम में आप सभी का स्वागत है।
आज हम बात करेंगे उत्कटासन के बारे में।

उत्कटासन का अर्थ

‘उत्कट’ का अर्थ है – दृढ़, शक्तिशाली या तीव्र
यह आसन ऐसे किया जाता है मानो आप एक काल्पनिक कुर्सी पर बैठे हों, इसलिए इसे चेयर पोज़ (Chair Pose) भी कहा जाता है।

विधि

  1. सबसे पहले समस्थिति (सीधे खड़े) में आ जाएं।
  2. दोनों हाथों को कंधों तक उठाएं और हथेलियों को आकाश की ओर करें।
  3. अब दोनों हाथों को ऊपर की ओर खींचें और कंधों को कानों से सटा लें।
  4. धीरे-धीरे ऐसे बैठें जैसे आप काल्पनिक कुर्सी पर बैठ रहे हों
  5. छाती फूली हुई रखें, रीढ़ सीधी रखें।
  6. दोनों हथेलियां मिली हुई हों और एड़ी-पंजे-घुटने एक-दूसरे से सटे रहें।
  7. इस स्थिति में कम से कम 1 मिनट तक रुकने का प्रयास करें।
  8. फिर धीरे-धीरे वापस प्रारंभिक स्थिति में आकर विश्राम करें
  9. आँखें बंद करके आसन से पहले और बाद में शरीर का अवलोकन करें

लाभ

  • पिंडलियों, घुटनों, कमर, जांघ और कंधों को मज़बूत बनाता है।
  • शरीर की संतुलन क्षमता और सहनशक्ति बढ़ाता है।
  • रीढ़ की हड्डी को सशक्त और लचीला बनाता है।
  • पाचन और रक्तसंचार में सुधार करता है।
  • मानसिक एकाग्रता और आत्मविश्वास को बढ़ाता है।

सावधानियां

  • एड़ी और पंजे मिले रहने चाहिए
  • घुटने, पंजों की सीध से आगे नहीं जाने चाहिए
  • दोनों हाथ और शरीर सीधे ताने हुए हों।
  • बाजू कान से लगे रहें।
  • हथेलियां आपस में मिली हुई रहें, और अंगूठे फंसे न हों

आप सभी आनंदित रहें, मस्त रहें, खुश रहें।
बहुत-बहुत धन्यवाद।

– योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक, योगापीस संस्थान

घुटनों के दर्द के लिए जानू चक्र

प्यारे मित्रों,
आप सभी को हमारा मुस्कुराता हुआ नमस्कार।
“एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर” आर्टिकल सीरीज़ में आप सभी का स्वागत है।

आज हम जानू चक्र के बारे में बात करेंगे।
घुटनों और पैरों को स्वस्थ रखने के लिए यह एक सर्वोत्तम क्रिया है।
इससे पहले हम गुल्फ नमन और गुल्फ चक्र के बारे में बात कर चुके हैं।
जानू चक्र क्रिया को आप कहीं भी और कभी भी कर सकते हैं।


जानू चक्र का अर्थ

‘जानू’ का अर्थ होता है घुटना, और ‘चक्र’ का अर्थ होता है गोलाकार घूमना
इस क्रिया में पैर के निचले हिस्से को घुटने से गोलाकार रूप में घुमाया जाता है


जानू चक्र करने की विधि

  1. सबसे पहले दंडासन में बैठें। (दंडासन के बारे में हम पहले विस्तार से बता चुके हैं।)
  2. दोनों पैरों को सामने की ओर सीधा रखें।
  3. अब अपने दाहिने पैर का घुटना मोड़ते हुए छाती से सटा लें
  4. दोनों हाथों से घुटने के पीछे से पैर को मजबूती से पकड़ें
  5. अब पैर को बाईं ओर से दाईं (दक्षिणावृत्त) दिशा में गोलाकार घुमाएँ।
    • कमर को बिल्कुल सीधा रखें।
    • तीन बार गोलाकार घुमाएँ।
    • लगभग 1 मिनट का समय लगेगा।
  6. अब पैर को दाईं ओर से बाईं (वामावृत्त) दिशा में तीन बार घुमाएँ।
    • प्रत्येक बार में 20 सेकंड का समय रखें।
    • कुल 1 मिनट में यह भाग पूरा करें।
  7. अब यही प्रक्रिया बाएँ पैर से दोहराएँ —
    • पहले वामावृत्त दिशा में, फिर दक्षिणावृत्त दिशा में।
    • दोनों दिशाओं में बराबर बार करें।
  8. दोनों पैरों से क्रिया पूर्ण करने के बाद आंखें बंद करके शरीर का अवलोकन करें।
    • क्रिया से पहले और बाद में पैरों में जो हल्कापन या परिवर्तन महसूस हो, उसे देखें।

समय:

  • दायाँ पैर — 2 मिनट
  • बायाँ पैर — 2 मिनट
  • अवलोकन — 1 मिनट
    👉 कुल समय: 5 मिनट

सावधानियाँ

  • पैर घुमाते समय नितंब और जांघ स्थिर रहें
  • कमर सीधी रखें और घुटने को कसकर पकड़ें।
  • क्रिया को धीरे-धीरे और नियंत्रित गति से करें।
  • दक्षिणावृत्त और वामावृत्त दोनों समान संख्या में करें।

लाभ

  • घुटनों के जोड़ मजबूत बनते हैं।
  • टांगों की मांसपेशियाँ लचीली होती हैं।
  • रक्त संचार में सुधार होता है।
  • घुटनों के दर्द और अकड़न से प्राकृतिक राहत मिलती है।

तो प्यारे मित्रों,
आप सभी इस क्रिया को रोज अवश्य करें और अपने घुटनों को स्वस्थ बनाएँ।

सत-सत नमन।
योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक – योगापीस संस्थान

कोणासन: मेरुदंड को लचीला और शरीर को स्वस्थ रखने वाला आसन

प्रिय मित्रों, आप सभी को हमारा मुस्कुराता हुआ नमस्कार।
“एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर” कार्यक्रम में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।
आप सब कैसे हैं? मुझे विश्वास है कि आप सभी अच्छे हैं — विशेषकर यदि आप रोज योगाभ्यास करते हैं।
नियमित योगाभ्यास से हमारे भीतर सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।

आज हम बात करेंगे — कोणासन के बारे में।
यह आसन हमारी मेरुदंड (spine) को लचीला बनाने के लिए अत्यंत लाभकारी है।

कोणासन करने की विधि

  1. सबसे पहले सीधे खड़े हो जाएं समस्थिति में।
  2. दोनों पैरों के बीच दो से ढाई फीट की दूरी रखें।
  3. दोनों हाथ जांघों को स्पर्श करते रहें।
  4. दायां हाथ धीरे-धीरे बगल से ऊपर उठाएं, हथेली को आकाश की ओर करें।
  5. हाथ को सिर के ऊपर सीधा तान लें।
  6. अब कमर को बाईं ओर झुकाएं, और बाएं हाथ की उंगलियों से बाएं पैर के पंजे को छूने का प्रयास करें।
  7. दायां हाथ सीधा रहे, कान के पास कनपटी से लगा हुआ।
  8. इस स्थिति में कम से कम 1 मिनट तक रहें।
  9. धीरे-धीरे आसन से बाहर आकर समस्थिति में लौटें।
  10. आंखें बंद कर के आसन से पहले और बाद के परिवर्तन को महसूस करें।

अब यही प्रक्रिया दूसरी ओर (दाईं ओर) करें —

  1. पैरों के बीच दो से ढाई फीट का अंतर बनाए रखें।
  2. बायां हाथ उठाएं, हथेली आकाश की ओर करें।
  3. हाथ को सिर के ऊपर सीधा तानें।
  4. कमर को दाईं ओर झुकाएं और दाएं पैर के पंजे को छूने का प्रयास करें।
  5. बायां हाथ सीधा रहे और कान के पास लगा हो।
  6. 1 मिनट तक इसी स्थिति में रहें।
  7. धीरे-धीरे वापस समस्थिति में आएं।
  8. आंखें बंद करके शरीर में आए परिवर्तन का अवलोकन करें।

कोणासन के लाभ

  • कंधे मजबूत बनते हैं।
  • पसलियों को लचीलापन मिलता है।
  • फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ती है।
  • हृदय स्वस्थ रहता है।
  • मेरुदंड लचीला और सक्रिय रहता है।
  • कमर के पार्श्व भाग में जमा वसा कम होता है।

सावधानियां

  • शरीर का केवल ऊपरी भाग ही झुकाएं।
  • कोहनियों व घुटनों को सीधा रखें।
  • दोनों पैरों के पंजे सीधे रहें।
  • दाएं या बाएं झुकते समय आगे या पीछे न झुकें, केवल पार्श्व दिशा में झुकें।
  • झुकते समय कमर से नहीं, बगल (armpit) से झुकें।
  • गर्दन को तनाव न दें — उसे सामान्य स्थिति में रखें।
  • दोनों पैरों में समान भार रखें।
  • नितंबों को हल्का संकुचित रखें।

आप सभी खुश रहें, मस्त रहें और आनंदित रहें।

– योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक, योगापीस संस्थान

उषा पान — पेट की बीमारियों का समाधान (भाग 2)

प्यारे मित्रों, आप सभी को हमारा मुस्कुराता हुआ नमस्कार।
“एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर” आर्टिकल सीरीज़ में आप सभी का स्वागत है।

आप सभी कैसे हैं?
मैं मानता हूं कि आप सभी अच्छे हैं — अगर आप रोज़ योगासन करते हैं।
रोज़ योगासन करने से हमारे अंदर सकारात्मक ऊर्जा भरी रहती है।

उषा पान क्या है?

पिछली बार हमने उषा पान के बारे में बात की थी।
आज हम आपको बताएंगे कि उषा पान कैसे करना चाहिए और किस प्रकार का पानी सबसे उपयुक्त होता है।

गर्मियों में उषा पान के लिए

गर्मियों के दिनों में मटके का पानी उषा पान के लिए सबसे श्रेष्ठ होता है।
हमारा शरीर पाँच तत्वों — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश — से मिलकर बना है।

मटका मिट्टी (पृथ्वी तत्व) से बनता है और उसे अग्नि तत्व से पकाया जाता है।
जब हम मटके में पानी रखते हैं, तो उसमें पाँचों तत्वों का समावेश हो जाता है —
इसलिए मटके का पानी शरीर के लिए अत्यंत लाभकारी होता है।

सर्दियों में उषा पान के लिए

सर्दियों में तांबे के बर्तन में रखा हुआ पानी सबसे उपयुक्त होता है।
रात में तांबे के बर्तन में पानी भरकर छोड़ दें और सुबह उठकर वही पानी पिएं।

यदि आप इसका अधिक लाभ लेना चाहते हैं, तो:

  • तांबे के बर्तन को लकड़ी के पाटे पर रखें (यह पृथ्वी और बर्तन के बीच कुचालक का कार्य करता है)।
  • ऊपर से जाली लगाकर खुले में रखें ताकि चंद्रमा की किरणें उस पर पड़ें।

तांबा अपने आप में जल को स्वच्छ और ऊर्जावान बनाने की क्षमता रखता है।

यदि तांबे का बर्तन न हो

अगर तांबे का बर्तन उपलब्ध न हो, तो आप काँच के बर्तन का उपयोग कर सकते हैं,
परंतु प्लास्टिक की बोतल का कभी उपयोग न करें।

आप एक प्रयोग करें —
रात में एक काँच और एक प्लास्टिक की बोतल में पानी भरकर रखें।
सुबह आप देखेंगे कि प्लास्टिक की बोतल में गंध (smell) आने लगती है।

गुनगुने पानी का प्रयोग

कुछ लोग कहते हैं कि उषा पान के लिए गुनगुना पानी लेना चाहिए,
लेकिन मेरे मतानुसार, सामान्य तापमान का पानी ही सर्वोत्तम है।

क्योंकि गुनगुने पानी की आदत शरीर को निर्भर बना देती है,
जबकि हर समय गुनगुना पानी उपलब्ध नहीं हो पाता।

हाँ, अगर सर्दी, जुकाम या खांसी हो तो उस स्थिति में गुनगुने पानी का उपयोग किया जा सकता है।

उषा पान के लाभ

उषा पान करने से हमारा पाचन तंत्र दुरुस्त रहता है।
यह कब्ज, अत्यधिक अम्लता (एसिडिटी) और अपच जैसी समस्याओं को दूर करने में मदद करता है।
पेट से संबंधित हर प्रकार के रोग में उषा पान लाभदायक सिद्ध होता है।

सावधानियां

  • यदि आप एक बार में अधिक पानी नहीं पी सकते,
    तो थोड़ी मात्रा से शुरू करें और धीरे-धीरे इसे बढ़ाएं।

समापन

आप सभी खुश रहें, मस्त रहें और आनंदित रहें।

योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक, योगापीस संस्थान

उषा पान – पेट की बीमारियों का समाधान (भाग 1)

प्यारे मित्रों,
आप सभी को हमारा मुस्कुराता हुआ नमस्कार। “एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर” कार्यक्रम में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।

आप सभी कैसे हैं?
मुझे विश्वास है कि आप सभी अच्छे हैं — विशेषकर यदि आप नियमित रूप से योगासन का अभ्यास करते हैं। योग करने से हमारे भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

आज हम चर्चा करेंगे “उषा पान” के विषय में।


उषा पान क्या है?

“उषा” का अर्थ है प्रातःकाल — अर्थात सूर्योदय की बेला।
प्रातःकाल उठने के बाद जल पीने को उषा पान कहा जाता है।

आयुर्वेद में उषा पान को “अमृत पान” की संज्ञा दी गई है, क्योंकि यह शरीर की कई बीमारियों से रक्षा करता है।
आयुर्वेद के अनुसार, अधिकांश बीमारियां हमारे पेट से संबंधित होती हैं।
यदि हम नियमित रूप से उषा पान करते हैं, तो इन पेट से जुड़ी बीमारियों से बचाव संभव है।


उषा पान करने की विधि

  • सुबह खाली पेट उठते ही, बिना कुल्ला किए, लगभग 1 से 1¼ लीटर पानी पीने का प्रयास करें।
  • पानी को गटागट पीना चाहिए, अर्थात एक बार में निरंतर पीएं।
  • यदि प्रारंभ में यह मात्रा अधिक लगे, तो जितना संभव हो उतना पीना शुरू करें और धीरे-धीरे मात्रा बढ़ाएं।

बिना कुल्ला किए पानी क्यों पीना चाहिए?

रातभर सोते समय हमारे मुंह में लार (Saliva) बनती है, जो पाचन तंत्र के लिए अत्यंत लाभकारी होती है।
इसी कारण सुबह बिना कुल्ला किए पानी पीना सबसे उत्तम माना गया है।

आप सोच सकते हैं कि सुबह मुंह तो गंदा होता है?
इसके लिए, रात में भोजन करने के बाद ही ब्रश या दातून से मुंह साफ करके सोएं, ताकि सुबह मुंह स्वच्छ रहे।


उषा पान करते समय बैठने की मुद्रा

  • उषा पान करते समय उकड़ू बैठें
    इससे पाचन तंत्र और आंतें मजबूत बनती हैं।
    यह मुद्रा घुटनों के लिए भी लाभकारी है।
  • यदि उकड़ू बैठना संभव न हो, तो कुर्सी या सोफे पर बैठकर भी पानी पी सकते हैं।

उषा पान के लाभ

  • पाचन तंत्र को मजबूत और सक्रिय बनाता है।
  • कब्ज और अत्यधिक अम्लता (Acidity) जैसी समस्याओं में राहत देता है।
  • अपच (Indigestion) की शिकायत को दूर करता है।
  • पेट से संबंधित हर प्रकार के रोग में सहायक है।

सावधानियां

  • यदि एक साथ अधिक पानी पीना कठिन लगे, तो थोड़ी मात्रा से शुरुआत करें
  • धीरे-धीरे पानी की मात्रा बढ़ाएं, ताकि शरीर को इसकी आदत हो जाए।

आप सभी खुश रहें, मस्त रहें और आनंदित रहें।

– योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक, योगापीस संस्थान