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Author: Yogacharya Dhakaram

Yogacharya Dhakaram, a beacon of yogic wisdom and well-being, invites you to explore the transformative power of yoga, nurturing body, mind, and spirit. His compassionate approach and holistic teachings guide you on a journey towards health and inner peace.

उत्कटासन – शरीर में शक्ति और संतुलन बढ़ाने वाला आसन

प्यारे मित्रों,
आप सभी को हमारा मुस्कुराता हुआ नमस्कार। एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर कार्यक्रम में आप सभी का स्वागत है।
आज हम बात करेंगे उत्कटासन के बारे में।

उत्कटासन का अर्थ

‘उत्कट’ का अर्थ है – दृढ़, शक्तिशाली या तीव्र
यह आसन ऐसे किया जाता है मानो आप एक काल्पनिक कुर्सी पर बैठे हों, इसलिए इसे चेयर पोज़ (Chair Pose) भी कहा जाता है।

विधि

  1. सबसे पहले समस्थिति (सीधे खड़े) में आ जाएं।
  2. दोनों हाथों को कंधों तक उठाएं और हथेलियों को आकाश की ओर करें।
  3. अब दोनों हाथों को ऊपर की ओर खींचें और कंधों को कानों से सटा लें।
  4. धीरे-धीरे ऐसे बैठें जैसे आप काल्पनिक कुर्सी पर बैठ रहे हों
  5. छाती फूली हुई रखें, रीढ़ सीधी रखें।
  6. दोनों हथेलियां मिली हुई हों और एड़ी-पंजे-घुटने एक-दूसरे से सटे रहें।
  7. इस स्थिति में कम से कम 1 मिनट तक रुकने का प्रयास करें।
  8. फिर धीरे-धीरे वापस प्रारंभिक स्थिति में आकर विश्राम करें
  9. आँखें बंद करके आसन से पहले और बाद में शरीर का अवलोकन करें

लाभ

  • पिंडलियों, घुटनों, कमर, जांघ और कंधों को मज़बूत बनाता है।
  • शरीर की संतुलन क्षमता और सहनशक्ति बढ़ाता है।
  • रीढ़ की हड्डी को सशक्त और लचीला बनाता है।
  • पाचन और रक्तसंचार में सुधार करता है।
  • मानसिक एकाग्रता और आत्मविश्वास को बढ़ाता है।

सावधानियां

  • एड़ी और पंजे मिले रहने चाहिए
  • घुटने, पंजों की सीध से आगे नहीं जाने चाहिए
  • दोनों हाथ और शरीर सीधे ताने हुए हों।
  • बाजू कान से लगे रहें।
  • हथेलियां आपस में मिली हुई रहें, और अंगूठे फंसे न हों

आप सभी आनंदित रहें, मस्त रहें, खुश रहें।
बहुत-बहुत धन्यवाद।

– योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक, योगापीस संस्थान

घुटनों के दर्द के लिए जानू चक्र

प्यारे मित्रों,
आप सभी को हमारा मुस्कुराता हुआ नमस्कार।
“एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर” आर्टिकल सीरीज़ में आप सभी का स्वागत है।

आज हम जानू चक्र के बारे में बात करेंगे।
घुटनों और पैरों को स्वस्थ रखने के लिए यह एक सर्वोत्तम क्रिया है।
इससे पहले हम गुल्फ नमन और गुल्फ चक्र के बारे में बात कर चुके हैं।
जानू चक्र क्रिया को आप कहीं भी और कभी भी कर सकते हैं।


जानू चक्र का अर्थ

‘जानू’ का अर्थ होता है घुटना, और ‘चक्र’ का अर्थ होता है गोलाकार घूमना
इस क्रिया में पैर के निचले हिस्से को घुटने से गोलाकार रूप में घुमाया जाता है


जानू चक्र करने की विधि

  1. सबसे पहले दंडासन में बैठें। (दंडासन के बारे में हम पहले विस्तार से बता चुके हैं।)
  2. दोनों पैरों को सामने की ओर सीधा रखें।
  3. अब अपने दाहिने पैर का घुटना मोड़ते हुए छाती से सटा लें
  4. दोनों हाथों से घुटने के पीछे से पैर को मजबूती से पकड़ें
  5. अब पैर को बाईं ओर से दाईं (दक्षिणावृत्त) दिशा में गोलाकार घुमाएँ।
    • कमर को बिल्कुल सीधा रखें।
    • तीन बार गोलाकार घुमाएँ।
    • लगभग 1 मिनट का समय लगेगा।
  6. अब पैर को दाईं ओर से बाईं (वामावृत्त) दिशा में तीन बार घुमाएँ।
    • प्रत्येक बार में 20 सेकंड का समय रखें।
    • कुल 1 मिनट में यह भाग पूरा करें।
  7. अब यही प्रक्रिया बाएँ पैर से दोहराएँ —
    • पहले वामावृत्त दिशा में, फिर दक्षिणावृत्त दिशा में।
    • दोनों दिशाओं में बराबर बार करें।
  8. दोनों पैरों से क्रिया पूर्ण करने के बाद आंखें बंद करके शरीर का अवलोकन करें।
    • क्रिया से पहले और बाद में पैरों में जो हल्कापन या परिवर्तन महसूस हो, उसे देखें।

समय:

  • दायाँ पैर — 2 मिनट
  • बायाँ पैर — 2 मिनट
  • अवलोकन — 1 मिनट
    👉 कुल समय: 5 मिनट

सावधानियाँ

  • पैर घुमाते समय नितंब और जांघ स्थिर रहें
  • कमर सीधी रखें और घुटने को कसकर पकड़ें।
  • क्रिया को धीरे-धीरे और नियंत्रित गति से करें।
  • दक्षिणावृत्त और वामावृत्त दोनों समान संख्या में करें।

लाभ

  • घुटनों के जोड़ मजबूत बनते हैं।
  • टांगों की मांसपेशियाँ लचीली होती हैं।
  • रक्त संचार में सुधार होता है।
  • घुटनों के दर्द और अकड़न से प्राकृतिक राहत मिलती है।

तो प्यारे मित्रों,
आप सभी इस क्रिया को रोज अवश्य करें और अपने घुटनों को स्वस्थ बनाएँ।

सत-सत नमन।
योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक – योगापीस संस्थान

कोणासन: मेरुदंड को लचीला और शरीर को स्वस्थ रखने वाला आसन

प्रिय मित्रों, आप सभी को हमारा मुस्कुराता हुआ नमस्कार।
“एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर” कार्यक्रम में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।
आप सब कैसे हैं? मुझे विश्वास है कि आप सभी अच्छे हैं — विशेषकर यदि आप रोज योगाभ्यास करते हैं।
नियमित योगाभ्यास से हमारे भीतर सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।

आज हम बात करेंगे — कोणासन के बारे में।
यह आसन हमारी मेरुदंड (spine) को लचीला बनाने के लिए अत्यंत लाभकारी है।

कोणासन करने की विधि

  1. सबसे पहले सीधे खड़े हो जाएं समस्थिति में।
  2. दोनों पैरों के बीच दो से ढाई फीट की दूरी रखें।
  3. दोनों हाथ जांघों को स्पर्श करते रहें।
  4. दायां हाथ धीरे-धीरे बगल से ऊपर उठाएं, हथेली को आकाश की ओर करें।
  5. हाथ को सिर के ऊपर सीधा तान लें।
  6. अब कमर को बाईं ओर झुकाएं, और बाएं हाथ की उंगलियों से बाएं पैर के पंजे को छूने का प्रयास करें।
  7. दायां हाथ सीधा रहे, कान के पास कनपटी से लगा हुआ।
  8. इस स्थिति में कम से कम 1 मिनट तक रहें।
  9. धीरे-धीरे आसन से बाहर आकर समस्थिति में लौटें।
  10. आंखें बंद कर के आसन से पहले और बाद के परिवर्तन को महसूस करें।

अब यही प्रक्रिया दूसरी ओर (दाईं ओर) करें —

  1. पैरों के बीच दो से ढाई फीट का अंतर बनाए रखें।
  2. बायां हाथ उठाएं, हथेली आकाश की ओर करें।
  3. हाथ को सिर के ऊपर सीधा तानें।
  4. कमर को दाईं ओर झुकाएं और दाएं पैर के पंजे को छूने का प्रयास करें।
  5. बायां हाथ सीधा रहे और कान के पास लगा हो।
  6. 1 मिनट तक इसी स्थिति में रहें।
  7. धीरे-धीरे वापस समस्थिति में आएं।
  8. आंखें बंद करके शरीर में आए परिवर्तन का अवलोकन करें।

कोणासन के लाभ

  • कंधे मजबूत बनते हैं।
  • पसलियों को लचीलापन मिलता है।
  • फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ती है।
  • हृदय स्वस्थ रहता है।
  • मेरुदंड लचीला और सक्रिय रहता है।
  • कमर के पार्श्व भाग में जमा वसा कम होता है।

सावधानियां

  • शरीर का केवल ऊपरी भाग ही झुकाएं।
  • कोहनियों व घुटनों को सीधा रखें।
  • दोनों पैरों के पंजे सीधे रहें।
  • दाएं या बाएं झुकते समय आगे या पीछे न झुकें, केवल पार्श्व दिशा में झुकें।
  • झुकते समय कमर से नहीं, बगल (armpit) से झुकें।
  • गर्दन को तनाव न दें — उसे सामान्य स्थिति में रखें।
  • दोनों पैरों में समान भार रखें।
  • नितंबों को हल्का संकुचित रखें।

आप सभी खुश रहें, मस्त रहें और आनंदित रहें।

– योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक, योगापीस संस्थान

उषा पान — पेट की बीमारियों का समाधान (भाग 2)

प्यारे मित्रों, आप सभी को हमारा मुस्कुराता हुआ नमस्कार।
“एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर” आर्टिकल सीरीज़ में आप सभी का स्वागत है।

आप सभी कैसे हैं?
मैं मानता हूं कि आप सभी अच्छे हैं — अगर आप रोज़ योगासन करते हैं।
रोज़ योगासन करने से हमारे अंदर सकारात्मक ऊर्जा भरी रहती है।

उषा पान क्या है?

पिछली बार हमने उषा पान के बारे में बात की थी।
आज हम आपको बताएंगे कि उषा पान कैसे करना चाहिए और किस प्रकार का पानी सबसे उपयुक्त होता है।

गर्मियों में उषा पान के लिए

गर्मियों के दिनों में मटके का पानी उषा पान के लिए सबसे श्रेष्ठ होता है।
हमारा शरीर पाँच तत्वों — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश — से मिलकर बना है।

मटका मिट्टी (पृथ्वी तत्व) से बनता है और उसे अग्नि तत्व से पकाया जाता है।
जब हम मटके में पानी रखते हैं, तो उसमें पाँचों तत्वों का समावेश हो जाता है —
इसलिए मटके का पानी शरीर के लिए अत्यंत लाभकारी होता है।

सर्दियों में उषा पान के लिए

सर्दियों में तांबे के बर्तन में रखा हुआ पानी सबसे उपयुक्त होता है।
रात में तांबे के बर्तन में पानी भरकर छोड़ दें और सुबह उठकर वही पानी पिएं।

यदि आप इसका अधिक लाभ लेना चाहते हैं, तो:

  • तांबे के बर्तन को लकड़ी के पाटे पर रखें (यह पृथ्वी और बर्तन के बीच कुचालक का कार्य करता है)।
  • ऊपर से जाली लगाकर खुले में रखें ताकि चंद्रमा की किरणें उस पर पड़ें।

तांबा अपने आप में जल को स्वच्छ और ऊर्जावान बनाने की क्षमता रखता है।

यदि तांबे का बर्तन न हो

अगर तांबे का बर्तन उपलब्ध न हो, तो आप काँच के बर्तन का उपयोग कर सकते हैं,
परंतु प्लास्टिक की बोतल का कभी उपयोग न करें।

आप एक प्रयोग करें —
रात में एक काँच और एक प्लास्टिक की बोतल में पानी भरकर रखें।
सुबह आप देखेंगे कि प्लास्टिक की बोतल में गंध (smell) आने लगती है।

गुनगुने पानी का प्रयोग

कुछ लोग कहते हैं कि उषा पान के लिए गुनगुना पानी लेना चाहिए,
लेकिन मेरे मतानुसार, सामान्य तापमान का पानी ही सर्वोत्तम है।

क्योंकि गुनगुने पानी की आदत शरीर को निर्भर बना देती है,
जबकि हर समय गुनगुना पानी उपलब्ध नहीं हो पाता।

हाँ, अगर सर्दी, जुकाम या खांसी हो तो उस स्थिति में गुनगुने पानी का उपयोग किया जा सकता है।

उषा पान के लाभ

उषा पान करने से हमारा पाचन तंत्र दुरुस्त रहता है।
यह कब्ज, अत्यधिक अम्लता (एसिडिटी) और अपच जैसी समस्याओं को दूर करने में मदद करता है।
पेट से संबंधित हर प्रकार के रोग में उषा पान लाभदायक सिद्ध होता है।

सावधानियां

  • यदि आप एक बार में अधिक पानी नहीं पी सकते,
    तो थोड़ी मात्रा से शुरू करें और धीरे-धीरे इसे बढ़ाएं।

समापन

आप सभी खुश रहें, मस्त रहें और आनंदित रहें।

योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक, योगापीस संस्थान

उषा पान – पेट की बीमारियों का समाधान (भाग 1)

प्यारे मित्रों,
आप सभी को हमारा मुस्कुराता हुआ नमस्कार। “एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर” कार्यक्रम में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।

आप सभी कैसे हैं?
मुझे विश्वास है कि आप सभी अच्छे हैं — विशेषकर यदि आप नियमित रूप से योगासन का अभ्यास करते हैं। योग करने से हमारे भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

आज हम चर्चा करेंगे “उषा पान” के विषय में।


उषा पान क्या है?

“उषा” का अर्थ है प्रातःकाल — अर्थात सूर्योदय की बेला।
प्रातःकाल उठने के बाद जल पीने को उषा पान कहा जाता है।

आयुर्वेद में उषा पान को “अमृत पान” की संज्ञा दी गई है, क्योंकि यह शरीर की कई बीमारियों से रक्षा करता है।
आयुर्वेद के अनुसार, अधिकांश बीमारियां हमारे पेट से संबंधित होती हैं।
यदि हम नियमित रूप से उषा पान करते हैं, तो इन पेट से जुड़ी बीमारियों से बचाव संभव है।


उषा पान करने की विधि

  • सुबह खाली पेट उठते ही, बिना कुल्ला किए, लगभग 1 से 1¼ लीटर पानी पीने का प्रयास करें।
  • पानी को गटागट पीना चाहिए, अर्थात एक बार में निरंतर पीएं।
  • यदि प्रारंभ में यह मात्रा अधिक लगे, तो जितना संभव हो उतना पीना शुरू करें और धीरे-धीरे मात्रा बढ़ाएं।

बिना कुल्ला किए पानी क्यों पीना चाहिए?

रातभर सोते समय हमारे मुंह में लार (Saliva) बनती है, जो पाचन तंत्र के लिए अत्यंत लाभकारी होती है।
इसी कारण सुबह बिना कुल्ला किए पानी पीना सबसे उत्तम माना गया है।

आप सोच सकते हैं कि सुबह मुंह तो गंदा होता है?
इसके लिए, रात में भोजन करने के बाद ही ब्रश या दातून से मुंह साफ करके सोएं, ताकि सुबह मुंह स्वच्छ रहे।


उषा पान करते समय बैठने की मुद्रा

  • उषा पान करते समय उकड़ू बैठें
    इससे पाचन तंत्र और आंतें मजबूत बनती हैं।
    यह मुद्रा घुटनों के लिए भी लाभकारी है।
  • यदि उकड़ू बैठना संभव न हो, तो कुर्सी या सोफे पर बैठकर भी पानी पी सकते हैं।

उषा पान के लाभ

  • पाचन तंत्र को मजबूत और सक्रिय बनाता है।
  • कब्ज और अत्यधिक अम्लता (Acidity) जैसी समस्याओं में राहत देता है।
  • अपच (Indigestion) की शिकायत को दूर करता है।
  • पेट से संबंधित हर प्रकार के रोग में सहायक है।

सावधानियां

  • यदि एक साथ अधिक पानी पीना कठिन लगे, तो थोड़ी मात्रा से शुरुआत करें
  • धीरे-धीरे पानी की मात्रा बढ़ाएं, ताकि शरीर को इसकी आदत हो जाए।

आप सभी खुश रहें, मस्त रहें और आनंदित रहें।

– योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक, योगापीस संस्थान

चंद्रभेदी प्राणायाम — शरीर को शीतलता देने वाला अद्भुत प्राणायाम

आप सभी को हमारा मुस्कुराता हुआ नमस्कार।
“एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर” कार्यक्रम में आप सभी का स्वागत है।

आज का हमारा शीर्षक है — चंद्रभेदी प्राणायाम।

चंद्रभेदी प्राणायाम से हमें गर्मी अधिक लगना, पसीना आना, मुंह में छाले, पेट में जलन, पेट के छाले आदि समस्याओं में बहुत लाभ मिलता है।

चंद्रभेदी प्राणायाम क्या है?

“चंद्रभेदी” का अर्थ है — चंद्रमा की तरह शीतलता प्रदान करने वाला।
शरीर में दो नथुने होते हैं —

  • दाहिना नथुना कहलाता है सूर्य नाड़ी
  • बायां नथुना कहलाता है चंद्र नाड़ी

जब हम बाएं नथुने से श्वास अंदर लेते हैं और दाहिने नथुने से श्वास बाहर छोड़ते हैं,
तो इसे चंद्रभेदी प्राणायाम कहा जाता है।

यह प्राणायाम गर्मी के मौसम में विशेष रूप से उपयोगी है।
जब वातावरण ठंडा हो या पंखा–कूलर बंद हो, तब इसे नहीं करना चाहिए।

यह शरीर को गर्मी से होने वाले सभी रोगों से बचाता है
इसे दिन में तीन बार — सुबह, दोपहर और शाम — किया जा सकता है।

चंद्रभेदी प्राणायाम करने की विधि

  1. किसी भी आसन में सुखपूर्वक बैठें।
  2. आपकी कमर, गर्दन और सिर एक सीध में हों।
  3. चेहरे और पेट की मांसपेशियों में खिंचाव नहीं होना चाहिए।
  4. अब प्राणायाम मुद्रा बनाएं —
    • तर्जनी और मध्यमा अंगुली को अंगूठे के पास रखें।
    • दाहिने हाथ का अंगूठा दाहिनी नासिका पर,
      और अनामिका व कनिष्ठा अंगुली बाईं नासिका पर रखें।
    • इस मुद्रा को नासिका मुद्रा भी कहते हैं।
  5. अब दाहिनी नासिका बंद रखकर बाईं नासिका से श्वास अंदर लें।
  6. फिर धीरे-धीरे दाहिनी नासिका से श्वास बाहर छोड़ें।
  7. इसी प्रकार अभ्यास को दोहराते रहें।
  8. अंत में आंखें बंद करके अवलोकन करें
    श्वास के प्रवाह को महसूस करें।

महत्वपूर्ण:
प्रत्येक प्राणायाम का वास्तविक लाभ तब मिलता है जब हम उसका अवलोकन (Observation) करते हैं।
जिस प्रकार बोतल का पुराना पानी निकालकर नया भरा जाता है,
उसी प्रकार श्वास को बाहर निकालकर नई ऊर्जा को अंदर लेना चाहिए।

सावधानियां

  • श्वास लेते समय नाक से आवाज नहीं आनी चाहिए।
  • हमेशा एक ही नासिका से श्वास अंदर और दूसरी से बाहर करें।
  • कमर व गर्दन सीधी रखें।
  • दाहिना हाथ कंधे के समानांतर उठा होना चाहिए।
  • नाक, नाभि की सीध में रहे।
  • प्राणायाम का समापन बाईं नासिका से श्वास अंदर लेते हुए करें।
  • यह प्राणायाम केवल गर्मी के मौसम में करें, सर्दियों में नहीं।

लाभ

  • उच्च रक्तचाप के रोगियों के लिए अत्यंत लाभकारी।
  • शरीर के नाड़ी तंत्र में शीतलता आती है।
  • मुंह के छाले, पेट के छाले, अधिक पसीना, अधिक गर्मी,
    नकसीर, पेट में जलन आदि समस्याओं में राहत देता है।

प्यारे मित्रों,
हमारे इस आर्टिकल को पढ़ने के लिए आप सभी का हार्दिक धन्यवाद।

योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक, योगापीस संस्थान

नमस्कार का योगिक महत्व

नमस्कार – केवल शिष्टाचार नहीं

भारतीय संस्कृति में नमस्कार केवल एक सामाजिक अभिवादन नहीं, बल्कि एक गहन शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक अभ्यास है।
जब हम नमस्कार को सही मुद्रा, सजगता और भाव से करते हैं, तो यह नम्रता, कृतज्ञता और आत्मिक जुड़ाव का प्रतीक बन जाता है।


नमस्कार का अर्थ

नमस्कार’ शब्द संस्कृत के “नम:” से बना है, जिसका अर्थ है – झुकना, विनम्र होना, स्वागत करना।
इसमें अहंकार का त्याग और सामने वाले के अस्तित्व का सम्मान छिपा होता है।


योगिक दृष्टि से नमस्कार की विधि

  1. दोनों हाथों की हथेलियाँ जोड़ें।
  2. अंगूठे छाती के मध्य (हृदय स्थल) को स्पर्श करें।
  3. हथेलियों की आकृति त्रिभुज (ऊपर की ओर शिखर जैसी) बनाएं।
  4. शरीर सीधा रखें, आँखें बंद हो सकती हैं, मन शांत रहे।

➡️ यह त्रिभुज आकृति हमें मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, पिरामिड आदि के शिखरों की याद दिलाती है — जो आध्यात्मिक ऊर्जा के केंद्रीकरण का प्रतीक हैं।


नमस्कार से मिलने वाले लाभ

  • शरीर की सूर्य (दायाँ) और चंद्र (बायाँ) ऊर्जा संतुलित होती है।
  • हृदय चक्र (अनाहत चक्र) सक्रिय होकर प्रेम, दया और करुणा उत्पन्न करता है।
  • दोनों हथेलियों को जोड़ने से मस्तिष्क के दोनों गोलार्ध सक्रिय होते हैं।
  • मानसिक संतुलन, ध्यान और एकाग्रता बढ़ती है।
  • छाती के पास हथेलियाँ रखने से हृदय गति संतुलित होती है और तनाव कम होता है।
  • यह parasympathetic nervous system को सक्रिय कर शांति और विश्रांति देता है।

आध्यात्मिक महत्त्व

जब हम नमस्कार को इस भाव से करते हैं कि —
“आपके भीतर जो दिव्यता है, उसे मैं प्रणाम करता हूँ”,
तब यह एक साधना बन जाता है।

शास्त्रों में:

  • मनुस्मृति और योगसूत्र में नमस्कार को “नम्रता की अभिव्यक्ति” और “आत्म-शुद्धि की क्रिया” कहा गया है।
  • भगवद्गीता (अध्याय 11) में अर्जुन श्रीकृष्ण को नमस्कार करते हुए कहते हैं:

“साक्षात्कृतं मे त्वमात्मानं… नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः”
अर्जुन ने भगवान के विराट रूप को देखकर हजार बार नमस्कार किया, जो आत्मिक समर्पण का प्रतीक है।


निष्कर्ष

नमस्कार केवल अभिवादन की परंपरा नहीं, बल्कि यह आध्यात्मिक विज्ञान है।
यदि इसे सजगता, विनम्रता और कृतज्ञता के साथ किया जाए, तो यह आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का साधन बन जाता है।

आइए, नमस्कार को केवल औपचारिकता न मानकर अपने जीवन में इसे योगिक और आत्मिक अभ्यास बनाएं —
जो हमारे भीतर विनम्रता, प्रेम और एकता का संचार करे।

आप सभी खुश रहें, मस्त रहें और आनंदित रहें।
धन्यवाद!

योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक, योगापीस संस्थान

🌞 नमस्कार मुद्रा – सूर्य नमस्कार की पहली सीढ़ी

प्यारे मित्रों,
आप सभी को हमारा मुस्कुराता हुआ नमस्कार।
“एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर” कार्यक्रम में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।

आप सभी कैसे हैं? आप सभी अवश्य अच्छे होंगे, क्योंकि आप नियमित रूप से योग करते हैं।
याद रखिए —

“हम किसी को बदल नहीं सकते, लेकिन **योग किसी को भी बदल सकता है।”

आज का विषय: सूर्य नमस्कार की प्रथम अवस्था – नमस्कार मुद्रा

हम सूर्य नमस्कार के विषय में पहले भी चर्चा कर चुके हैं।
आज हम उसकी प्रत्येक अवस्था और आसन को क्रमबद्ध रूप से समझेंगे, ताकि हम उन्हें शुद्ध विधि से कर सकें और उनका पूर्ण लाभ प्राप्त कर सकें।

सूर्य नमस्कार के 12 चरण होते हैं, जिनमें कुल 7 प्रमुख आसन समाहित हैं।

आज हम आरंभ करेंगे प्रथम चरण – नमस्कार मुद्रा से।

नमस्कार मुद्रा करने की विधि

  1. सबसे पहले सम-स्थिति में अपने दोनों पैरों को मिलाकर खड़े हो जाएं।
  2. अब अपने दोनों हाथों को छाती के सामने जोड़ते हुए नमस्कार मुद्रा बनाएं।

सामान्य त्रुटियाँ जो लोग करते हैं:

  • कई लोग कोहनियों को तान देते हैं, जिससे एक घमंड का भाव झलकता है। सूर्य भगवान को नमस्कार आदरभाव से करना है, अहंकार से नहीं।
  • कुछ लोग हाथों से छाती को क्रॉस कर लेते हैं, जिससे फेफड़े सिकुड़ जाते हैं और श्वास छोटी हो जाती है।

सही मुद्रा:

  • कोहनियाँ थोड़ी ढीली रखें।
  • हाथों को उठाते हुए डायाफ्राम के पास लाएं और जोड़ते हुए छाती के मध्य (sternum) पर टिकाएं।
  • दोनों अंगूठे आपस में मिले हों, और उरोस्थि से सटे हों।

त्रिकोण और ऊर्जा का संबंध

  • मंदिर, मस्जिद, चर्च, पिरामिड – ये सभी त्रिकोणीय संरचनाएं हैं।
  • त्रिकोण एक ऊर्जा स्रोत है।
  • नमस्कार मुद्रा बनाते समय हमारे हाथों का भी त्रिकोण बनता है, जो शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है।

इसलिए, नमस्कार मुद्रा लगाते समय आपके मन में सूर्य देव के प्रति आदर भाव होना चाहिए।

ध्यान और आभार

नमस्कार मुद्रा में आते ही:

  • आंखें बंद करें
  • मन में कहें:
    “हे सूर्य भगवान, आपकी तेज किरणें और लालिमा हमें प्राप्त हो।”

आगे क्या?

आगामी लेखों में हम बताएंगे:

  • सूर्य नमस्कार की तैयारी कैसे करें
  • कैसे इसे सही विधि से करें और उसका पूर्ण लाभ प्राप्त करें।

तो प्यारे मित्रों,
आप सभी को हमारा सत्-सत् नमन।
आप सभी खुश रहें, मस्त रहें, आनंदित रहें।

आपका बहुत-बहुत आभार।
धन्यवाद।

योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक – योगापीस संस्थान

ऑफिस में बैठने से होने वाली गर्दन व कंधे की जकड़न का सरल समाधान

हरि ओम आप सभी को हमारा मुस्कुराता हुआ नमस्कार।
“एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर” कार्यक्रम में आप सभी का स्वागत है।

ऑफिस में बैठने से उत्पन्न सामान्य समस्याएं

  • जब आप ऑफिस में लंबे समय तक बैठते हैं, तो अक्सर:
    • कंधों में जकड़न
    • गर्दन में दर्द
  • लैपटॉप, मोबाइल या डेस्क वर्क के दौरान झुके हुए कंधे और गर्दन इस समस्या को बढ़ाते हैं।

समाधान – सही बैठने की विधि

  • बैठने की स्थिति:
    • कुर्सी या सोफे के किनारे पर बैठें।
    • दोनों हाथों की उंगलियों को पीठ के पीछे ले जाकर आपस में फंसाएं (Interlock करें)।
    • हाथों की कलाई को कुर्सी के डंडे पर रखें।
    • छाती आगे की ओर फूली रहे और कमर सीधी बनी रहे।
  • ध्यान देने योग्य बातें:
    • कलाई और उंगलियों के बीच का हिस्सा ही कुर्सी पर रखें।
    • कलाई की हड्डी को कुर्सी पर रखने से बचें, इससे दर्द हो सकता है।
    • यदि कलाई में दर्द हो, तो उसके नीचे तौलिया रखें।
    • सोफे पर करने पर तौलिये की आवश्यकता नहीं होगी।

अभ्यास के दौरान क्या करें

  • शरीर को तनावमुक्त रखें।
  • अभ्यास तब तक करें जब तक कंधों में हल्का दर्द न हो।
  • फिर धीरे-धीरे हाथ नीचे लाकर जांघों पर रखें।
  • आंखें बंद करें और शरीर में होने वाले परिवर्तन को महसूस करें।

अभ्यास का महत्व

  • किसी भी प्राणायाम या आसन के दौरान:
    • आंखें बंद कर शरीर पर प्रभाव को महसूस करें।
    • इससे मांसपेशियों में तनाव नहीं रहता और वे शिथिल हो जाती हैं।

नियमित अभ्यास के लाभ

  • लंबे समय तक झुकी स्थिति में बैठने से बचाव।
  • नियमित अभ्यास से:
    • सर्वाइकल से राहत
    • फ्रोजन शोल्डर की रोकथाम
    • कंधे की जकड़न में आराम
  • जो पहले से इन समस्याओं से ग्रस्त हैं, उन्हें भी लाभ मिलेगा।

प्यारे मित्रों,

  • केवल इसे पढ़ना नहीं है, नियमित अभ्यास भी करना है
  • हमारे साथ जुड़े रहें और अपने स्वास्थ्य का लाभ लेते रहें।

आप सभी को सत-सत नमन।
खुश रहें, मस्त रहें और आनंदित रहें।

योगाचार्य ढाका राम
संस्थापक, योगापीस संस्थान

शीर्षासन (भाग 1) – आसनों का राजा

प्यारे मित्रों, आप सभी को हमारा मुस्कुराता हुआ नमस्कार।
“एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर” आर्टिकल सीरीज़ में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।

आज हम बात करेंगे शीर्षासन के बारे में।
शीर्षासन को आसनों का राजा कहा जाता है। यह संस्कृत के दो शब्दों — ‘शीर्ष’ (सिर) और ‘आसन’ (मुद्रा) — से मिलकर बना है। शीर्षासन सबसे अधिक लाभ देने वाला आसन माना गया है क्योंकि यह हमारे अंतःस्रावी प्रणाली (Endocrine System) को सक्रिय करता है।


शीर्षासन करते समय सावधानियाँ और तैयारी

यदि आपको शीर्षासन आता है, तो भी इसे किसी को दिखाने के लिए अचानक न करें
यह एक साधना है जिसे पूरे मन और तैयारी के साथ करना चाहिए।

हमारे सिर की त्वचा पैरों की तुलना में अधिक संवेदनशील होती है, इसलिए सुरक्षा और स्थिरता का ध्यान रखना आवश्यक है।


शीर्षासन की विधि

  1. आवश्यक सामग्री:
    एक कंबल या चटाई लें जिसकी लंबाई लगभग 2 फीट, चौड़ाई 2 फीट और ऊँचाई 2 से 3 इंच हो।
  2. हाथों की स्थिति:
    हाथों की उंगलियों को आपस में फंसा लें और कोहनियों को कंधों की चौड़ाई जितना खोलें।
    अब कोहनियाँ और उंगलियाँ मिलाकर त्रिकोण बनाएं।
  3. सिर की स्थिति:
    सिर के सबसे ऊपरी भाग को जमीन पर रखें और हथेलियाँ सिर के उभरे हुए हिस्से पर टिकाएँ।
  4. शरीर की स्थिति:
    कमर सीधी रखें, दोनों घुटनों को मोड़ते हुए धीरे-धीरे पैरों को ऊपर उठाएँ।
    फिर पैरों को सीधा करें और शरीर को संतुलित करें।
    नितंब संकुचित रहें और श्वास सामान्य रखें।
  5. अवधि:
    शुरुआती अभ्यास में 1–2 मिनट पर्याप्त हैं।
    अभ्यास बढ़ने पर 5 मिनट तक शीर्षासन करें।

शीर्षासन के बाद की स्थिति

आसन से बाहर आते समय धीरे-धीरे पैरों को मोड़ें और शशांक आसन में आएँ।
सिर को हाथों पर रखकर कुछ समय विश्राम करें।
इसके बाद शवासन में लेटकर शरीर को पूर्ण आराम दें।

ध्यान रखें कि गर्दन पर अधिक तनाव न पड़े — इसके लिए कंधों को हल्का ऊपर उठाकर रखें।


शीर्षासन के लाभ

  • चेहरे पर स्वाभाविक चमक आती है।
  • बालों का झड़ना रुकता है और वे घने व काले बनते हैं।
  • पाचन तंत्र मजबूत होता है।
  • अंतःस्रावी ग्रंथियाँ सक्रिय होकर हार्मोन संतुलन बनाती हैं।
  • संपूर्ण शरीर पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।

शीर्षासन करते समय सावधानियाँ

  • कभी भी जल्दबाजी या झटके से पैरों को ऊपर न उठाएँ।
  • गर्दन पर अधिक दबाव न डालें।
  • अभ्यास हमेशा खाली पेट और योग्य प्रशिक्षक की देखरेख में करें।

तो प्यारे मित्रों, आप सभी को सत्-सत् नमन।
अगले भाग में हम शीर्षासन से जुड़े और गहराईपूर्ण रहस्यों को जानेंगे।

योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक – योगापीस संस्थान