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Tag: योगऔरपाचनतंत्र

नमस्कार का योगिक महत्व

नमस्कार – केवल शिष्टाचार नहीं

भारतीय संस्कृति में नमस्कार केवल एक सामाजिक अभिवादन नहीं, बल्कि एक गहन शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक अभ्यास है।
जब हम नमस्कार को सही मुद्रा, सजगता और भाव से करते हैं, तो यह नम्रता, कृतज्ञता और आत्मिक जुड़ाव का प्रतीक बन जाता है।


नमस्कार का अर्थ

नमस्कार’ शब्द संस्कृत के “नम:” से बना है, जिसका अर्थ है – झुकना, विनम्र होना, स्वागत करना।
इसमें अहंकार का त्याग और सामने वाले के अस्तित्व का सम्मान छिपा होता है।


योगिक दृष्टि से नमस्कार की विधि

  1. दोनों हाथों की हथेलियाँ जोड़ें।
  2. अंगूठे छाती के मध्य (हृदय स्थल) को स्पर्श करें।
  3. हथेलियों की आकृति त्रिभुज (ऊपर की ओर शिखर जैसी) बनाएं।
  4. शरीर सीधा रखें, आँखें बंद हो सकती हैं, मन शांत रहे।

➡️ यह त्रिभुज आकृति हमें मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, पिरामिड आदि के शिखरों की याद दिलाती है — जो आध्यात्मिक ऊर्जा के केंद्रीकरण का प्रतीक हैं।


नमस्कार से मिलने वाले लाभ

  • शरीर की सूर्य (दायाँ) और चंद्र (बायाँ) ऊर्जा संतुलित होती है।
  • हृदय चक्र (अनाहत चक्र) सक्रिय होकर प्रेम, दया और करुणा उत्पन्न करता है।
  • दोनों हथेलियों को जोड़ने से मस्तिष्क के दोनों गोलार्ध सक्रिय होते हैं।
  • मानसिक संतुलन, ध्यान और एकाग्रता बढ़ती है।
  • छाती के पास हथेलियाँ रखने से हृदय गति संतुलित होती है और तनाव कम होता है।
  • यह parasympathetic nervous system को सक्रिय कर शांति और विश्रांति देता है।

आध्यात्मिक महत्त्व

जब हम नमस्कार को इस भाव से करते हैं कि —
“आपके भीतर जो दिव्यता है, उसे मैं प्रणाम करता हूँ”,
तब यह एक साधना बन जाता है।

शास्त्रों में:

  • मनुस्मृति और योगसूत्र में नमस्कार को “नम्रता की अभिव्यक्ति” और “आत्म-शुद्धि की क्रिया” कहा गया है।
  • भगवद्गीता (अध्याय 11) में अर्जुन श्रीकृष्ण को नमस्कार करते हुए कहते हैं:

“साक्षात्कृतं मे त्वमात्मानं… नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः”
अर्जुन ने भगवान के विराट रूप को देखकर हजार बार नमस्कार किया, जो आत्मिक समर्पण का प्रतीक है।


निष्कर्ष

नमस्कार केवल अभिवादन की परंपरा नहीं, बल्कि यह आध्यात्मिक विज्ञान है।
यदि इसे सजगता, विनम्रता और कृतज्ञता के साथ किया जाए, तो यह आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का साधन बन जाता है।

आइए, नमस्कार को केवल औपचारिकता न मानकर अपने जीवन में इसे योगिक और आत्मिक अभ्यास बनाएं —
जो हमारे भीतर विनम्रता, प्रेम और एकता का संचार करे।

आप सभी खुश रहें, मस्त रहें और आनंदित रहें।
धन्यवाद!

योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक, योगापीस संस्थान

ऑफिस में बैठने से होने वाली गर्दन व कंधे की जकड़न का सरल समाधान

हरि ओम आप सभी को हमारा मुस्कुराता हुआ नमस्कार।
“एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर” कार्यक्रम में आप सभी का स्वागत है।

ऑफिस में बैठने से उत्पन्न सामान्य समस्याएं

  • जब आप ऑफिस में लंबे समय तक बैठते हैं, तो अक्सर:
    • कंधों में जकड़न
    • गर्दन में दर्द
  • लैपटॉप, मोबाइल या डेस्क वर्क के दौरान झुके हुए कंधे और गर्दन इस समस्या को बढ़ाते हैं।

समाधान – सही बैठने की विधि

  • बैठने की स्थिति:
    • कुर्सी या सोफे के किनारे पर बैठें।
    • दोनों हाथों की उंगलियों को पीठ के पीछे ले जाकर आपस में फंसाएं (Interlock करें)।
    • हाथों की कलाई को कुर्सी के डंडे पर रखें।
    • छाती आगे की ओर फूली रहे और कमर सीधी बनी रहे।
  • ध्यान देने योग्य बातें:
    • कलाई और उंगलियों के बीच का हिस्सा ही कुर्सी पर रखें।
    • कलाई की हड्डी को कुर्सी पर रखने से बचें, इससे दर्द हो सकता है।
    • यदि कलाई में दर्द हो, तो उसके नीचे तौलिया रखें।
    • सोफे पर करने पर तौलिये की आवश्यकता नहीं होगी।

अभ्यास के दौरान क्या करें

  • शरीर को तनावमुक्त रखें।
  • अभ्यास तब तक करें जब तक कंधों में हल्का दर्द न हो।
  • फिर धीरे-धीरे हाथ नीचे लाकर जांघों पर रखें।
  • आंखें बंद करें और शरीर में होने वाले परिवर्तन को महसूस करें।

अभ्यास का महत्व

  • किसी भी प्राणायाम या आसन के दौरान:
    • आंखें बंद कर शरीर पर प्रभाव को महसूस करें।
    • इससे मांसपेशियों में तनाव नहीं रहता और वे शिथिल हो जाती हैं।

नियमित अभ्यास के लाभ

  • लंबे समय तक झुकी स्थिति में बैठने से बचाव।
  • नियमित अभ्यास से:
    • सर्वाइकल से राहत
    • फ्रोजन शोल्डर की रोकथाम
    • कंधे की जकड़न में आराम
  • जो पहले से इन समस्याओं से ग्रस्त हैं, उन्हें भी लाभ मिलेगा।

प्यारे मित्रों,

  • केवल इसे पढ़ना नहीं है, नियमित अभ्यास भी करना है
  • हमारे साथ जुड़े रहें और अपने स्वास्थ्य का लाभ लेते रहें।

आप सभी को सत-सत नमन।
खुश रहें, मस्त रहें और आनंदित रहें।

योगाचार्य ढाका राम
संस्थापक, योगापीस संस्थान

शीर्षासन (भाग 1) – आसनों का राजा

प्यारे मित्रों, आप सभी को हमारा मुस्कुराता हुआ नमस्कार।
“एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर” आर्टिकल सीरीज़ में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।

आज हम बात करेंगे शीर्षासन के बारे में।
शीर्षासन को आसनों का राजा कहा जाता है। यह संस्कृत के दो शब्दों — ‘शीर्ष’ (सिर) और ‘आसन’ (मुद्रा) — से मिलकर बना है। शीर्षासन सबसे अधिक लाभ देने वाला आसन माना गया है क्योंकि यह हमारे अंतःस्रावी प्रणाली (Endocrine System) को सक्रिय करता है।


शीर्षासन करते समय सावधानियाँ और तैयारी

यदि आपको शीर्षासन आता है, तो भी इसे किसी को दिखाने के लिए अचानक न करें
यह एक साधना है जिसे पूरे मन और तैयारी के साथ करना चाहिए।

हमारे सिर की त्वचा पैरों की तुलना में अधिक संवेदनशील होती है, इसलिए सुरक्षा और स्थिरता का ध्यान रखना आवश्यक है।


शीर्षासन की विधि

  1. आवश्यक सामग्री:
    एक कंबल या चटाई लें जिसकी लंबाई लगभग 2 फीट, चौड़ाई 2 फीट और ऊँचाई 2 से 3 इंच हो।
  2. हाथों की स्थिति:
    हाथों की उंगलियों को आपस में फंसा लें और कोहनियों को कंधों की चौड़ाई जितना खोलें।
    अब कोहनियाँ और उंगलियाँ मिलाकर त्रिकोण बनाएं।
  3. सिर की स्थिति:
    सिर के सबसे ऊपरी भाग को जमीन पर रखें और हथेलियाँ सिर के उभरे हुए हिस्से पर टिकाएँ।
  4. शरीर की स्थिति:
    कमर सीधी रखें, दोनों घुटनों को मोड़ते हुए धीरे-धीरे पैरों को ऊपर उठाएँ।
    फिर पैरों को सीधा करें और शरीर को संतुलित करें।
    नितंब संकुचित रहें और श्वास सामान्य रखें।
  5. अवधि:
    शुरुआती अभ्यास में 1–2 मिनट पर्याप्त हैं।
    अभ्यास बढ़ने पर 5 मिनट तक शीर्षासन करें।

शीर्षासन के बाद की स्थिति

आसन से बाहर आते समय धीरे-धीरे पैरों को मोड़ें और शशांक आसन में आएँ।
सिर को हाथों पर रखकर कुछ समय विश्राम करें।
इसके बाद शवासन में लेटकर शरीर को पूर्ण आराम दें।

ध्यान रखें कि गर्दन पर अधिक तनाव न पड़े — इसके लिए कंधों को हल्का ऊपर उठाकर रखें।


शीर्षासन के लाभ

  • चेहरे पर स्वाभाविक चमक आती है।
  • बालों का झड़ना रुकता है और वे घने व काले बनते हैं।
  • पाचन तंत्र मजबूत होता है।
  • अंतःस्रावी ग्रंथियाँ सक्रिय होकर हार्मोन संतुलन बनाती हैं।
  • संपूर्ण शरीर पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।

शीर्षासन करते समय सावधानियाँ

  • कभी भी जल्दबाजी या झटके से पैरों को ऊपर न उठाएँ।
  • गर्दन पर अधिक दबाव न डालें।
  • अभ्यास हमेशा खाली पेट और योग्य प्रशिक्षक की देखरेख में करें।

तो प्यारे मित्रों, आप सभी को सत्-सत् नमन।
अगले भाग में हम शीर्षासन से जुड़े और गहराईपूर्ण रहस्यों को जानेंगे।

योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक – योगापीस संस्थान

शांत मन, स्वस्थ जीवन: तीन प्रभावशाली प्राणायाम

हरि ओम।
हरि ओम आप सभी को हमारा मुस्कुराता हुआ नमस्कार। कहते हैं मुस्कुराहट के बिना कुछ नहीं है इसलिए हमेशा मुस्कुराते रहना चाहिए। “एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर” इस श्रृंखला में आपका स्वागत है।

आज हम चर्चा करेंगे तीन विशेष प्राणायामों की,
जो मन की शांति और स्वस्थ जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी हैं —
कपालभाति, भस्त्रिका, और अनुलोम-विलोम प्राणायाम


शरीर के तीन मुख्य भाग और प्राणायाम का प्रभाव

हमारे शरीर को यदि तीन प्रमुख हिस्सों में बाँटें —

  • सिर (मस्तिष्क)
  • छाती (फेफड़े, हृदय)
  • पेट (पाचन तंत्र)

तो इन तीनों प्राणायामों का असर क्रमशः इन तीन अंगों पर पड़ता है:

प्राणायामप्रभाव का क्षेत्र
कपालभातिपेट (पाचन तंत्र)
भस्त्रिकाछाती (फेफड़े व हृदय)
अनुलोम-विलोममस्तिष्क व मन (नाड़ी शुद्धि)

कपालभाति प्राणायाम

लाभ:

  • पाचन तंत्र को मजबूत बनाता है।
  • पेट के अंगों की मालिश होती है।
  • श्वसन प्रणाली की शुद्धि करता है।

विधि:

  • सुखासन, पद्मासन या स्वास्तिक में बैठें।
  • प्राण मुद्रा में हाथ रखें (सर्वोत्तम विकल्प)।
  • आँखें बंद करें। श्वास को झटके से बाहर निकालें।
  • हर श्वास निष्कासन पर पेट अंदर की ओर स्वतः खिंचता है।
  • कम से कम 4–5 मिनट करें।
  • अंत में 1 मिनट विश्राम करें और शरीर का निरीक्षण करें।

सावधानियाँ:

  • गर्भवती महिलाएं, माहवारी के दौरान, अल्सर, हर्निया, कमर दर्द या पेट ऑपरेशन के बाद न करें।

भस्त्रिका प्राणायाम

लाभ:

  • फेफड़ों और हृदय की कार्यक्षमता बढ़ाता है।
  • शरीर में ऑक्सीजन की आपूर्ति बढ़ाता है।
  • मन को शांत करता है, रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।

विधि:

  • पद्मासन या कोई भी आरामदायक आसन लें।
  • दोनों हाथों को श्वास भरते समय सिर के ऊपर ले जाएं।
  • श्वास छोड़ते हुए हाथों को जांघों पर ले आएं।
  • आंखें बंद रखें और यह प्रक्रिया कम से कम 4 मिनट करें।
  • बाद में 1 मिनट विश्राम और अवलोकन करें।

अनुलोम-विलोम प्राणायाम

लाभ:

  • मस्तिष्क को शीतलता और शांति प्रदान करता है।
  • एकाग्रता, स्मरण शक्ति, तनाव, माइग्रेन, रक्तचाप आदि समस्याओं में लाभकारी।
  • मानसिक संतुलन और स्थिरता लाता है।

विधि:

  • किसी भी आरामदायक आसन में बैठें।
  • नासिका मुद्रा (अंगूठा और अनामिका से) बनाएं।
  • दायीं नासिका बंद कर बायीं से श्वास लें → दायीं से निकालें → फिर दायीं से लें → बायीं से निकालें।
  • यह चक्र दोहराते रहें।
  • समाप्ति बायीं नासिका से श्वास बाहर निकाल कर करें।
  • बाद में विश्राम करें और परिवर्तन महसूस करें।

निष्कर्ष: योगमय जीवन की ओर

  • जीवन में योग और प्राणायाम को अपनाएं।
  • नियमित अभ्यास से मन, शरीर और आत्मा तीनों में संतुलन आता है।
  • यह तीन प्राणायाम मन को स्थिरता और भीतर की शांति देते हैं।

प्रिय मित्रों,
आपका हृदय से धन्यवाद, हमेशा मुस्कुराते रहें, आनंदित रहें।
स्वस्थ जीवन की ओर हर दिन एक कदम आगे बढ़ाएं।


योगाचार्य ढाका राम
संस्थापक, योगापीस संस्थान

एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर : पर्वतासन

हरि ओम 🙏 आप सभी को हमारा मुस्कुराता हुआ नमस्कार।

एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर कार्यक्रम में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।

आजकल हमारे ब्लॉग सूर्य नमस्कार की श्रृंखला पर चल रहे हैं। पिछले ब्लॉग में हमने अश्व संचालन आसन के बारे में जाना था। आज हम बात करेंगे पर्वतासन (Mountain Pose) के बारे में।

शरीर की स्थिति पर्वत के समान होने के कारण इस आसन को पर्वतासन कहते हैं। यह हमारे पूरे शरीर के लिए अत्यंत लाभकारी है। जब हम इसे करते हैं, तो यह शरीर में खिंचाव लाता है, शक्ति प्रदान करता है और मन को शांत करता है।


अश्व संचालन आसन से पर्वतासन में कैसे आएं

  • अश्व संचालन आसन में हमारा दायाँ पैर पीछे रहता है।
  • पर्वतासन में आने के लिए कमर को ऊपर उठाते हुए धीरे से बायाँ पैर भी पीछे ले जाएँ।
  • बाएँ पैर की एड़ी को दाएँ पैर की एड़ी से मिलाएँ।
  • नितंबों और लोअर बैक को ऊपर की ओर खींचकर रखें।
  • सिर हमारे हाथों के बीच में रहेगा।
  • दोनों पैर सीधे रहेंगे और एड़ियाँ जमीन से लगी रहेंगी।
  • नितंब ऊपर आकाश की ओर खिंचे रहेंगे।

पर्वतासन करते समय ध्यान रखें

  • घुटने सीधे रहेंगे।
  • एड़ियों को जमीन से लगाने का प्रयास करेंगे।
  • शरीर का संतुलन बनाते हुए कम से कम 20 सेकंड इसी अवस्था में रुकने का प्रयास करें।

पर्वतासन के लाभ

  • कंधों को मजबूत बनाता है।
  • पैरों के लिए अत्यंत लाभकारी है।
  • सिर की ओर रक्त संचार बढ़ने से चेहरे पर निखार आता है।
  • दिमाग सक्रिय और दुरुस्त रहता है।
  • मेरुदंड को लचीला बनाता है।

विशेष टिप्पणी

जब हम पर्वतासन करते हैं तो चेहरा नीचे की ओर होता है। इससे रक्त का प्रवाह चेहरे की ओर बढ़ता है और त्वचा में ताजगी एवं चमक आती है।

अगले ब्लॉग की झलक

प्यारे मित्रों! अगले ब्लॉग में हम भुजंगासन के बारे में बात करेंगे। आप सब हमारे साथ इसी प्रकार जुड़े रहें और अपने स्वास्थ्य का लाभ उठाते रहें।

तो प्यारे मित्रों, आप सभी को सत-सत नमन।
आप सभी खुश रहें, मस्त रहें और आनंदित रहें।

योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक – योगापीस संस्थान

मुस्कान के साथ स्वास्थ्य की ओर – उत्थित पद्मासन का अभ्यास

हरि ओम!
आप सभी को हमारा मुस्कुराता हुआ नमस्कार। कहते हैं – मुस्कुराहट के बिना कुछ नहीं, इसलिए आइए हमेशा मुस्कुराते रहें।
“एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर” कार्यक्रम में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।

आज का विषय: उत्थित पद्मासन (Uttit Padmasana)

‘उत्थित’ का अर्थ है – उठा हुआ, और ‘पद्मासन’ का अर्थ है – कमल की मुद्रा।
अतः उत्थित पद्मासन = उठा हुआ पद्मासन

अभ्यास विधि:

  1. पद्मासन में बैठना:
    • दंडासन में बैठ जाएं।
    • दाहिने पैर को मोड़ें और एड़ी को नाभि से सटाकर बाईं जांघ पर रखें।
    • फिर बाएं पैर को मोड़कर उसकी एड़ी को दाईं जांघ पर रखें।
  2. हाथों की स्थिति:
    • दोनों हथेलियाँ जमीन पर रखें – नितंबों के दोनों ओर।
  3. उत्थान प्रक्रिया:
    • धीरे-धीरे शरीर को ऊपर उठाएं।
    • कमर बिल्कुल सीधी रखें।
    • नितंब और घुटने जमीन के समांतर हों।
    • दोनों हाथ सीधे और कोहनियाँ बिना मुड़े रहें।
    • दृष्टि सामने रखें।
  4. स्थिति बनाए रखें:
    • 30 सेकंड से लेकर 1 मिनट तक इस अवस्था में रहें।
    • शरीर को यथासंभव ऊपर उठाने का प्रयास करें।
  5. वापस आने की प्रक्रिया:
    • धीरे-धीरे जिस क्रम में गए थे उसी तरह वापस आएं।
    • आंखें बंद करें और शरीर में आए परिवर्तन का अवलोकन करें।

लाभ (Benefits):

  • कंधे मजबूत बनते हैं।
  • मेरुदंड (spine) को बल और लचीलापन मिलता है।
  • पेट की मांसपेशियों में खिंचाव आकर पाचन तंत्र सुधरता है।

यदि पद्मासन न लगे तो क्या करें?

  • सुखासन में भी यह आसन किया जा सकता है।
  • जो पैरों को न उठा सकें, वे केवल नितंब उठाकर अभ्यास शुरू करें।
  • अभ्यास के साथ कंधों में ताकत आएगी और धीरे-धीरे पूरा आसन संभव हो जाएगा।

सावधानियाँ (Precautions):

  • गर्भवती महिलाएं यह आसन न करें।
  • जिनका हाल ही में पेट का ऑपरेशन हुआ हो, वे भी न करें।
  • जिनकी कलाई में दर्द हो, वे इस अभ्यास से बचें।

प्रिय मित्रों,
आप हमारे साथ नियमित अभ्यास करते रहें। अगर कोई आसन नहीं होता, तो अभ्यास करते रहें – धीरे-धीरे सब संभव होगा। घबराने की जरूरत नहीं है।
हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं – आप स्वस्थ, मस्त और आनंदित रहें।

आप सभी का हार्दिक आभार।

योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक – योगापीस संस्थान

सही आसन, सही जीवन: बैठने का योगिक महत्व

शरीर का वजन बैठते समय कहाँ होता है?

योग केवल आसनों या शारीरिक मुद्राओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शरीर, मन और आत्मा के संतुलन की सम्पूर्ण विद्या है। जब हम साधना के लिए किसी आसन में बैठते हैं – विशेषकर सुखासन, पद्मासन या पला‍थी जैसी स्थितियों में – तब शरीर का भार किस प्रकार से वितरित होता है, इसका गहरा प्रभाव हमारी शारीरिक व मानसिक स्थिति पर पड़ता है।

बैठने पर शरीर का भार कहाँ जाता है?

जब हम पालथी मारकर बैठते हैं, तब शरीर का सम्पूर्ण भार कूल्हों (Hip joints), टांगों की हड्डियों (Femurs), तथा श्रोणि (Pelvis) की हड्डियों के माध्यम से ज़मीन पर जाता है। यह भार मुख्य रूप से दोनों कूल्हों (Ischial tuberosities) पर होना चाहिए।

यदि शरीर का वजन किसी एक ओर (दाएँ या बाएँ कूल्हे पर) अधिक हो जाए, तो शरीर का संरेखन (Alignment) बिगड़ जाता है। लंबे समय तक ऐसा बैठने से रीढ़, पीठ, घुटनों और यहाँ तक कि गर्दन पर भी असंतुलन उत्पन्न होता है।

ठीक उसी तरह जैसे गाड़ी के टायरों में हवा असमान हो तो गाड़ी झुक जाती है और उसकी चेसिस खराब हो सकती है, वैसे ही शरीर का भार असमान हो तो कई शारीरिक समस्याएँ जन्म लेती हैं।

संभावित समस्याएँ

  • रीढ़ की हड्डी का झुकाव (Scoliosis/kyphosis)
  • घुटनों पर असमान दबाव → गठिया या कूल्हों की जकड़न
  • झुकी हुई पीठ और संकुचित छाती → फेफड़ों की कार्यक्षमता में कमी
  • असंतुलन से प्राण ऊर्जा का व्यर्थ व्यय → थकान और मानसिक तनाव

योगशास्त्र का मार्गदर्शन

स्थिरं सुखं आसनम्” – अर्थात वह आसन जिसमें स्थिरता और सुख हो।

इसीलिए बैठते समय ध्यान रखें:

  • दोनों कूल्हों को ज़मीन पर बराबरी से टिकाएँ, आवश्यकता हो तो कुशन/कंबल का सहारा लें।
  • पीठ सीधी रखें और छाती को ओपन चेस्ट स्थिति में रखें।
  • कंधों को पीछे घुमाकर ढीला छोड़ें।
  • गर्दन सीधी और ठोड़ी थोड़ी अंदर (जालंधर बंध की भाँति)

सही बैठक के लाभ

  1. मांसपेशीय तनाव में कमी – समान भार वितरण से अनावश्यक खिंचाव नहीं होता।
  2. स्नायु-तंत्र की सक्रियता – उचित मुद्रा से मानसिक एकाग्रता और भावनात्मक संतुलन बढ़ता है।
  3. श्वसन प्रणाली में सुधार – खुली छाती व सीधी पीठ से फेफड़े पूरी तरह फैलते हैं।
  4. रक्त संचार और ऊर्जा प्रवाह – सही मुद्रा से रक्त प्रवाह व चक्र सक्रिय रहते हैं।

निष्कर्ष

योग में आसन केवल बाहरी मुद्रा नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना का माध्यम हैं। जब हम अपने शरीर का भार सम रूप से वितरित करते हैं और रीढ़ की स्थिति सही रखते हैं, तो शारीरिक, मानसिक और आत्मिक संतुलन प्राप्त होता है।

जैसे मजबूत नींव वाली इमारत हर तूफान में अडिग रहती है, वैसे ही योग में सही संरेखन और भार संतुलन हमें जीवन की हर परिस्थिति में स्थिर और ऊर्जावान बनाए रखता है।

आप सभी खुश रहें, मस्त रहें और आनंदित रहें।
धन्यवाद!

योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक, योगापीस संस्थान

एंजायटी को कम करने का सरल उपाय: भस्त्रिका प्राणायाम

हरि ओम, आप सभी को हमारा मुस्कुराता हुआ नमस्कार! कहते हैं, मुस्कुराहट के बिना कुछ नहीं है, इसलिए हमेशा मुस्कुराते रहना चाहिए। “एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर” कार्यक्रम में आप सभी का स्वागत है।

एंजायटी: आज की सबसे बड़ी समस्या

आज हम बात करेंगे एंजायटी के बारे में और जानेंगे कि इसे कैसे कम किया जाए। आजकल हर किसी को एंजायटी होने लगी है। समय के साथ आकांक्षाएं और महत्वाकांक्षाएं बढ़ गई हैं, जिससे हर समय तनाव बना रहता है।

आज हम एक बिल्कुल सरल अभ्यास बताएंगे, जिसे करके आप एंजायटी से मुक्त रह सकते हैं। हम पहले भी भस्त्रिका प्राणायाम के बारे में चर्चा कर चुके हैं, लेकिन आज हम इसे एंजायटी मैनेजमेंट के लिए समझेंगे।

भस्त्रिका प्राणायाम: एंजायटी से मुक्ति का मार्ग

भस्त्रिका प्राणायाम एक ऐसा अभ्यास है, जिसे आप रोज करके अपने आप को तनावमुक्त रख सकते हैं। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे कभी भी, कहीं भी किया जा सकता है—चाहे आप सोफ़े पर बैठे हों, कुर्सी पर हों, या फिर जमीन पर। बस जरूरत है तो सांसों पर ध्यान केंद्रित करने की।

जब हम भस्त्रिका करते हैं, तो हमारा पूरा ध्यान सांसों पर होता है, जिससे मन शांत रहता है और एंजायटी दूर होती है।

भस्त्रिका प्राणायाम करने की विधि

  1. आसन: पद्मासन में बैठें। अगर पद्मासन में बैठने में कठिनाई हो, तो किसी भी आरामदायक मुद्रा में बैठ सकते हैं।
  2. हाथों की स्थिति:
  • श्वास भरते हुए हाथों को छाती के सामने से सिर के ऊपर ले जाएं (हथेलियाँ सामने की ओर)।
  • श्वास छोड़ते हुए हाथों को वापस छाती के सामने लाकर जांघों पर रख दें।
  1. अवधि: कम से कम 4 मिनट तक करें, फिर 1 मिनट का विश्राम लें।
  2. अनुभूति: अभ्यास से पहले और बाद में अपने शरीर में होने वाले परिवर्तनों को महसूस करें।
  3. नियमितता: प्रतिदिन कम से कम 5 मिनट भस्त्रिका प्राणायाम जरूर करें।

भस्त्रिका प्राणायाम के लाभ

  • मन की शांति: जब हम आंखें बंद करके भस्त्रिका करते हैं और ध्यान सांसों पर केंद्रित होता है, तो मन इधर-उधर नहीं भटकता। इससे मन शांत रहता है और एंजायटी कम होती है।
  • गहरी सांस का महत्व: जितना हमारा श्वास लंबा और गहरा होगा, मन उतना ही शांत रहेगा। मन और सांस का गहरा संबंध है।
  • ऑक्सीजन की आपूर्ति: भस्त्रिका से फेफड़ों में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ती है, जो रक्त के माध्यम से पूरे शरीर में पहुँचती है। इससे ऊर्जा बढ़ती है और एंजायटी कम होती है।
  • हृदय व फेफड़ों के लिए फायदेमंद: यह प्राणायाम हृदय और फेफड़ों से जुड़ी समस्याओं को दूर करने में सहायक है।
  • रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है: नियमित अभ्यास से इम्यूनिटी मजबूत होती है।

निष्कर्ष: योग को अपनाएं, स्वस्थ जीवन जिएं

अपने जीवन को योगमय बनाएं। नियमित रूप से आसन और प्राणायाम का अभ्यास करें। प्यारे मित्रों, हमारे साथ जुड़े रहें और अपने स्वास्थ्य का लाभ उठाते रहें।

आप सभी खुश रहें, मस्त रहें और आनंदित रहें।
धन्यवाद!

योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक, योगापीस संस्थान

हनुमान आसन: लचीलापन और शक्ति का संगम

हरि ओम!
आप सभी को हमारा मुस्कुराता हुआ नमस्कार।
कहते हैं — “मुस्कुराहट के बिना जीवन अधूरा है,”
इसलिए हमेशा मुस्कुराइए और स्वस्थ रहिए।

“एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर” कार्यक्रम में आपका हार्दिक स्वागत है।
आज हम बात करेंगे एक अद्भुत एवं शक्तिशाली योगासन — हनुमान आसन के बारे में।

हनुमान आसन का परिचय

  • यह एक उन्नत (एडवांस) योगासन है।
  • इससे पैरों में शक्ति, मांसपेशियों में लचीलापन और पेल्विक रीजन में मजबूती आती है।
  • यह आसन शरीर में ऊर्जा का संचार करता है और संतुलन की भावना को विकसित करता है।

हनुमान आसन की विधि

  1. सीधे खड़े होकर पैरों को जितना संभव हो खोलें।
  2. शरीर को दाहिनी ओर मोड़ें, दोनों हाथ जांघों के पास रखें।
  3. दाएं पैर का पंजा 90° पर मोड़ें, और बाएं पैर को पीछे की ओर सीधा करें।
  4. धीरे-धीरे पैरों को फैलाएं, जल्दबाजी न करें।
  5. पीछे का घुटना सीधा रखें और पैर को पीछे ले जाएं
  6. आगे वाले पैर को आगे ले जाकर पंजा सीधा रखें।
  7. धीरे-धीरे जांघ जमीन से सटा दें
  8. इस स्थिति में 1-2 मिनट तक रुकें।
  9. फिर धीरे-धीरे पूर्व स्थिति में लौटें।
  10. अब यही प्रक्रिया बाएं पैर से दोहराएं।

सावधानियाँ और अभ्यास के सुझाव

  • धैर्य रखें, जितना बन पाए उतना करें।
  • जहाँ तक पैर खुलें वहाँ पर रुकें और 1-2 मिनट स्थिर रहें।
  • दोनों ओर बराबर अभ्यास करना आवश्यक है।
  • नियमित अभ्यास से हर सप्ताह लचीलापन बढ़ेगा
  • रोज़ 10 मिनट अभ्यास से 3-4 महीनों में पूर्ण आसन संभव हो सकता है।

अभ्यास को और प्रभावी बनाने की तकनीक

  1. दंडासन में बैठें, पैरों को सामने खोलें।
  2. कमर सीधी रखकर आगे की ओर झुकें – 1 मिनट रुकें
  3. फिर दाईं ओर शरीर मोड़ते हुए हनुमान आसन में जाएँ – 1 मिनट रुकें
  4. फिर बाईं ओर भी यही प्रक्रिया दोहराएं।
  5. तीनों दिशाओं में यह अभ्यास 3 बार दोहराएं
  6. अंत में सामने की ओर झुककर 1 मिनट रुकें और फिर विश्राम करें।

हनुमान आसन के लाभ

  • पेल्विक क्षेत्र को मजबूती देता है।
  • पैरों की मांसपेशियों को लचीलापन प्रदान करता है।
  • रीढ़ की हड्डी और छाती को मजबूती देता है।
  • मानसिक स्थिरता और आत्मविश्वास को बढ़ाता है।

आत्मबोधन और समर्पण का अभ्यास

योग केवल शरीर का नहीं, आत्मा और मन का भी अभ्यास है।
धैर्य, समर्पण और नियमितता से आप हर योगासन को पूर्णता की ओर ले जा सकते हैं।
अपने शरीर की सीमाओं को पहचानिए और धीरे-धीरे उसे विस्तार दीजिए।

तो प्यारे मित्रों,
आप सभी को सत-सत नमन।
आप हमेशा स्वस्थ, मस्त और आनंदित रहें।
हमारे साथ बने रहें और योग के माध्यम से अपने जीवन को धन्य बनाते रहें।

आपका योगमित्र,
योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक – योगापीस संस्थान

आंखों से संबंधित समस्याओं को कैसे दूर रखें: नेत्र शक्ति विकासक क्रिया

नमस्कार मित्रों आप सभी को हमारा मुस्कुराता हुआ नमन! आज हम “एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर” कार्यक्रम में नेत्र शक्ति विकासक क्रिया के बारे में बात करेंगे।

आंखों की समस्याएं: एक बढ़ती चिंता

आजकल हम सभी मोबाइल फोन, कंप्यूटर और टीवी का अत्यधिक उपयोग करते हैं। जिसके कारण आंखों में सूखापन, कमजोरी और थकान जैसी समस्याएं आम हो गई हैं। इन समस्याओं से बचने और आंखों को स्वस्थ रखने के लिए हमें नेत्र शक्ति विकासक क्रिया का अभ्यास करना चाहिए।

नेत्र शक्ति विकासक क्रिया क्या है?

यह एक सरल योग क्रिया है जो आंखों की मांसपेशियों को मजबूत बनाती है, आंखों की रोशनी बढ़ाने में मदद करती है और आंखों से संबंधित समस्याओं को दूर रखती है।

नेत्र शक्ति विकासक क्रिया कैसे करें:

  1. जमीन पर, कुर्सी पर, सोफे पर या बेड पर सीधे बैठ जाएं।
  2. अपने दोनों हाथों को बगल में फैलाकर कंधे के बराबर मुष्टि बना लें। आपका अंगूठा ऊपर की तरफ होना चाहिए।
  3. तिरछी नजर से 10 से 15 सेकंड के लिए दाहिने हाथ के अंगूठे को देखें। अपनी गर्दन सीधी रखें।
  4. 10 से 15 सेकंड रुकने के बाद आंखों को बाईं ओर, बाएं हाथ के अंगूठे को देखें।
  5. धीरे-धीरे अपनी आंखों को दाईं ओर और बाईं ओर देखना शुरू करें।
  6. इस क्रिया को दोहराएं। नेत्र शक्ति विकासक क्रिया करते समय 15 सेकंड दाईं ओर और 15 सेकंड बाईं ओर देखना है। इस प्रकार आपको इसे 6 बार करना होगा (तीन बार दाहिनी ओर और तीन बार बाईं ओर)।
  7. नेत्र शक्ति विकासक क्रिया करने के बाद आंखें बंद करके आंखों की मांसपेशियों को आराम दें और उनमें आए बदलाव को महसूस करें।

नेत्र शक्ति विकासक क्रिया करते समय ध्यान रखने योग्य बातें:

  • अपनी गर्दन को सीधा रखें और तिरछी नजर से अंगूठे की तरफ देखें।
  • अपने हाथों को पूरी तरह से तना हुआ रखें।
  • अपने चेहरे पर मुस्कुराहट रखें और तनाव मुक्त रहें।
  • अपने कंधों को सामान्य रूप से रखें, उठे हुए नहीं।

नेत्र शक्ति विकासक क्रिया के लाभ:

  • आंखों की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है
  • आंखों की रोशनी बढ़ाने में मदद करता है
  • आंखों में सूखापन और कमजोरी को कम करता है
  • आंखों की थकान को दूर करता है
  • आंखों से संबंधित समस्याओं को दूर रखता है

अतिरिक्त सुझाव:

  • नहाते समय अपनी आंखों को पानी से धोएं।
  • अपनी आंखों को साफ रखने के लिए ठंडे पानी से धोएं।
  • आंखों को स्वस्थ रखने के लिए आंवला और पपीता का सेवन करें।
  • आंखों की रोशनी बढ़ाने के लिए त्रिफला के पानी से आंखों को धो सकते हैं।

निष्कर्ष:

नेत्र शक्ति विकासक क्रिया एक सरल और प्रभावी क्रिया है जो आंखों को स्वस्थ रखने में मदद करती है। इसे नियमित रूप से करें और आंखों से संबंधित समस्याओं से मुक्ति पाएं।

धन्यवाद!

योगाचार्य ढाका राम
संस्थापक, योगापीस संस्थान