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चंद्रभेदी प्राणायाम — शरीर को शीतलता देने वाला अद्भुत प्राणायाम

आप सभी को हमारा मुस्कुराता हुआ नमस्कार।
“एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर” कार्यक्रम में आप सभी का स्वागत है।

आज का हमारा शीर्षक है — चंद्रभेदी प्राणायाम।

चंद्रभेदी प्राणायाम से हमें गर्मी अधिक लगना, पसीना आना, मुंह में छाले, पेट में जलन, पेट के छाले आदि समस्याओं में बहुत लाभ मिलता है।

चंद्रभेदी प्राणायाम क्या है?

“चंद्रभेदी” का अर्थ है — चंद्रमा की तरह शीतलता प्रदान करने वाला।
शरीर में दो नथुने होते हैं —

  • दाहिना नथुना कहलाता है सूर्य नाड़ी
  • बायां नथुना कहलाता है चंद्र नाड़ी

जब हम बाएं नथुने से श्वास अंदर लेते हैं और दाहिने नथुने से श्वास बाहर छोड़ते हैं,
तो इसे चंद्रभेदी प्राणायाम कहा जाता है।

यह प्राणायाम गर्मी के मौसम में विशेष रूप से उपयोगी है।
जब वातावरण ठंडा हो या पंखा–कूलर बंद हो, तब इसे नहीं करना चाहिए।

यह शरीर को गर्मी से होने वाले सभी रोगों से बचाता है
इसे दिन में तीन बार — सुबह, दोपहर और शाम — किया जा सकता है।

चंद्रभेदी प्राणायाम करने की विधि

  1. किसी भी आसन में सुखपूर्वक बैठें।
  2. आपकी कमर, गर्दन और सिर एक सीध में हों।
  3. चेहरे और पेट की मांसपेशियों में खिंचाव नहीं होना चाहिए।
  4. अब प्राणायाम मुद्रा बनाएं —
    • तर्जनी और मध्यमा अंगुली को अंगूठे के पास रखें।
    • दाहिने हाथ का अंगूठा दाहिनी नासिका पर,
      और अनामिका व कनिष्ठा अंगुली बाईं नासिका पर रखें।
    • इस मुद्रा को नासिका मुद्रा भी कहते हैं।
  5. अब दाहिनी नासिका बंद रखकर बाईं नासिका से श्वास अंदर लें।
  6. फिर धीरे-धीरे दाहिनी नासिका से श्वास बाहर छोड़ें।
  7. इसी प्रकार अभ्यास को दोहराते रहें।
  8. अंत में आंखें बंद करके अवलोकन करें
    श्वास के प्रवाह को महसूस करें।

महत्वपूर्ण:
प्रत्येक प्राणायाम का वास्तविक लाभ तब मिलता है जब हम उसका अवलोकन (Observation) करते हैं।
जिस प्रकार बोतल का पुराना पानी निकालकर नया भरा जाता है,
उसी प्रकार श्वास को बाहर निकालकर नई ऊर्जा को अंदर लेना चाहिए।

सावधानियां

  • श्वास लेते समय नाक से आवाज नहीं आनी चाहिए।
  • हमेशा एक ही नासिका से श्वास अंदर और दूसरी से बाहर करें।
  • कमर व गर्दन सीधी रखें।
  • दाहिना हाथ कंधे के समानांतर उठा होना चाहिए।
  • नाक, नाभि की सीध में रहे।
  • प्राणायाम का समापन बाईं नासिका से श्वास अंदर लेते हुए करें।
  • यह प्राणायाम केवल गर्मी के मौसम में करें, सर्दियों में नहीं।

लाभ

  • उच्च रक्तचाप के रोगियों के लिए अत्यंत लाभकारी।
  • शरीर के नाड़ी तंत्र में शीतलता आती है।
  • मुंह के छाले, पेट के छाले, अधिक पसीना, अधिक गर्मी,
    नकसीर, पेट में जलन आदि समस्याओं में राहत देता है।

प्यारे मित्रों,
हमारे इस आर्टिकल को पढ़ने के लिए आप सभी का हार्दिक धन्यवाद।

योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक, योगापीस संस्थान

नमस्कार का योगिक महत्व

नमस्कार – केवल शिष्टाचार नहीं

भारतीय संस्कृति में नमस्कार केवल एक सामाजिक अभिवादन नहीं, बल्कि एक गहन शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक अभ्यास है।
जब हम नमस्कार को सही मुद्रा, सजगता और भाव से करते हैं, तो यह नम्रता, कृतज्ञता और आत्मिक जुड़ाव का प्रतीक बन जाता है।


नमस्कार का अर्थ

नमस्कार’ शब्द संस्कृत के “नम:” से बना है, जिसका अर्थ है – झुकना, विनम्र होना, स्वागत करना।
इसमें अहंकार का त्याग और सामने वाले के अस्तित्व का सम्मान छिपा होता है।


योगिक दृष्टि से नमस्कार की विधि

  1. दोनों हाथों की हथेलियाँ जोड़ें।
  2. अंगूठे छाती के मध्य (हृदय स्थल) को स्पर्श करें।
  3. हथेलियों की आकृति त्रिभुज (ऊपर की ओर शिखर जैसी) बनाएं।
  4. शरीर सीधा रखें, आँखें बंद हो सकती हैं, मन शांत रहे।

➡️ यह त्रिभुज आकृति हमें मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, पिरामिड आदि के शिखरों की याद दिलाती है — जो आध्यात्मिक ऊर्जा के केंद्रीकरण का प्रतीक हैं।


नमस्कार से मिलने वाले लाभ

  • शरीर की सूर्य (दायाँ) और चंद्र (बायाँ) ऊर्जा संतुलित होती है।
  • हृदय चक्र (अनाहत चक्र) सक्रिय होकर प्रेम, दया और करुणा उत्पन्न करता है।
  • दोनों हथेलियों को जोड़ने से मस्तिष्क के दोनों गोलार्ध सक्रिय होते हैं।
  • मानसिक संतुलन, ध्यान और एकाग्रता बढ़ती है।
  • छाती के पास हथेलियाँ रखने से हृदय गति संतुलित होती है और तनाव कम होता है।
  • यह parasympathetic nervous system को सक्रिय कर शांति और विश्रांति देता है।

आध्यात्मिक महत्त्व

जब हम नमस्कार को इस भाव से करते हैं कि —
“आपके भीतर जो दिव्यता है, उसे मैं प्रणाम करता हूँ”,
तब यह एक साधना बन जाता है।

शास्त्रों में:

  • मनुस्मृति और योगसूत्र में नमस्कार को “नम्रता की अभिव्यक्ति” और “आत्म-शुद्धि की क्रिया” कहा गया है।
  • भगवद्गीता (अध्याय 11) में अर्जुन श्रीकृष्ण को नमस्कार करते हुए कहते हैं:

“साक्षात्कृतं मे त्वमात्मानं… नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः”
अर्जुन ने भगवान के विराट रूप को देखकर हजार बार नमस्कार किया, जो आत्मिक समर्पण का प्रतीक है।


निष्कर्ष

नमस्कार केवल अभिवादन की परंपरा नहीं, बल्कि यह आध्यात्मिक विज्ञान है।
यदि इसे सजगता, विनम्रता और कृतज्ञता के साथ किया जाए, तो यह आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का साधन बन जाता है।

आइए, नमस्कार को केवल औपचारिकता न मानकर अपने जीवन में इसे योगिक और आत्मिक अभ्यास बनाएं —
जो हमारे भीतर विनम्रता, प्रेम और एकता का संचार करे।

आप सभी खुश रहें, मस्त रहें और आनंदित रहें।
धन्यवाद!

योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक, योगापीस संस्थान

🌞 नमस्कार मुद्रा – सूर्य नमस्कार की पहली सीढ़ी

प्यारे मित्रों,
आप सभी को हमारा मुस्कुराता हुआ नमस्कार।
“एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर” कार्यक्रम में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।

आप सभी कैसे हैं? आप सभी अवश्य अच्छे होंगे, क्योंकि आप नियमित रूप से योग करते हैं।
याद रखिए —

“हम किसी को बदल नहीं सकते, लेकिन **योग किसी को भी बदल सकता है।”

आज का विषय: सूर्य नमस्कार की प्रथम अवस्था – नमस्कार मुद्रा

हम सूर्य नमस्कार के विषय में पहले भी चर्चा कर चुके हैं।
आज हम उसकी प्रत्येक अवस्था और आसन को क्रमबद्ध रूप से समझेंगे, ताकि हम उन्हें शुद्ध विधि से कर सकें और उनका पूर्ण लाभ प्राप्त कर सकें।

सूर्य नमस्कार के 12 चरण होते हैं, जिनमें कुल 7 प्रमुख आसन समाहित हैं।

आज हम आरंभ करेंगे प्रथम चरण – नमस्कार मुद्रा से।

नमस्कार मुद्रा करने की विधि

  1. सबसे पहले सम-स्थिति में अपने दोनों पैरों को मिलाकर खड़े हो जाएं।
  2. अब अपने दोनों हाथों को छाती के सामने जोड़ते हुए नमस्कार मुद्रा बनाएं।

सामान्य त्रुटियाँ जो लोग करते हैं:

  • कई लोग कोहनियों को तान देते हैं, जिससे एक घमंड का भाव झलकता है। सूर्य भगवान को नमस्कार आदरभाव से करना है, अहंकार से नहीं।
  • कुछ लोग हाथों से छाती को क्रॉस कर लेते हैं, जिससे फेफड़े सिकुड़ जाते हैं और श्वास छोटी हो जाती है।

सही मुद्रा:

  • कोहनियाँ थोड़ी ढीली रखें।
  • हाथों को उठाते हुए डायाफ्राम के पास लाएं और जोड़ते हुए छाती के मध्य (sternum) पर टिकाएं।
  • दोनों अंगूठे आपस में मिले हों, और उरोस्थि से सटे हों।

त्रिकोण और ऊर्जा का संबंध

  • मंदिर, मस्जिद, चर्च, पिरामिड – ये सभी त्रिकोणीय संरचनाएं हैं।
  • त्रिकोण एक ऊर्जा स्रोत है।
  • नमस्कार मुद्रा बनाते समय हमारे हाथों का भी त्रिकोण बनता है, जो शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है।

इसलिए, नमस्कार मुद्रा लगाते समय आपके मन में सूर्य देव के प्रति आदर भाव होना चाहिए।

ध्यान और आभार

नमस्कार मुद्रा में आते ही:

  • आंखें बंद करें
  • मन में कहें:
    “हे सूर्य भगवान, आपकी तेज किरणें और लालिमा हमें प्राप्त हो।”

आगे क्या?

आगामी लेखों में हम बताएंगे:

  • सूर्य नमस्कार की तैयारी कैसे करें
  • कैसे इसे सही विधि से करें और उसका पूर्ण लाभ प्राप्त करें।

तो प्यारे मित्रों,
आप सभी को हमारा सत्-सत् नमन।
आप सभी खुश रहें, मस्त रहें, आनंदित रहें।

आपका बहुत-बहुत आभार।
धन्यवाद।

योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक – योगापीस संस्थान

ऑफिस में बैठने से होने वाली गर्दन व कंधे की जकड़न का सरल समाधान

हरि ओम आप सभी को हमारा मुस्कुराता हुआ नमस्कार।
“एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर” कार्यक्रम में आप सभी का स्वागत है।

ऑफिस में बैठने से उत्पन्न सामान्य समस्याएं

  • जब आप ऑफिस में लंबे समय तक बैठते हैं, तो अक्सर:
    • कंधों में जकड़न
    • गर्दन में दर्द
  • लैपटॉप, मोबाइल या डेस्क वर्क के दौरान झुके हुए कंधे और गर्दन इस समस्या को बढ़ाते हैं।

समाधान – सही बैठने की विधि

  • बैठने की स्थिति:
    • कुर्सी या सोफे के किनारे पर बैठें।
    • दोनों हाथों की उंगलियों को पीठ के पीछे ले जाकर आपस में फंसाएं (Interlock करें)।
    • हाथों की कलाई को कुर्सी के डंडे पर रखें।
    • छाती आगे की ओर फूली रहे और कमर सीधी बनी रहे।
  • ध्यान देने योग्य बातें:
    • कलाई और उंगलियों के बीच का हिस्सा ही कुर्सी पर रखें।
    • कलाई की हड्डी को कुर्सी पर रखने से बचें, इससे दर्द हो सकता है।
    • यदि कलाई में दर्द हो, तो उसके नीचे तौलिया रखें।
    • सोफे पर करने पर तौलिये की आवश्यकता नहीं होगी।

अभ्यास के दौरान क्या करें

  • शरीर को तनावमुक्त रखें।
  • अभ्यास तब तक करें जब तक कंधों में हल्का दर्द न हो।
  • फिर धीरे-धीरे हाथ नीचे लाकर जांघों पर रखें।
  • आंखें बंद करें और शरीर में होने वाले परिवर्तन को महसूस करें।

अभ्यास का महत्व

  • किसी भी प्राणायाम या आसन के दौरान:
    • आंखें बंद कर शरीर पर प्रभाव को महसूस करें।
    • इससे मांसपेशियों में तनाव नहीं रहता और वे शिथिल हो जाती हैं।

नियमित अभ्यास के लाभ

  • लंबे समय तक झुकी स्थिति में बैठने से बचाव।
  • नियमित अभ्यास से:
    • सर्वाइकल से राहत
    • फ्रोजन शोल्डर की रोकथाम
    • कंधे की जकड़न में आराम
  • जो पहले से इन समस्याओं से ग्रस्त हैं, उन्हें भी लाभ मिलेगा।

प्यारे मित्रों,

  • केवल इसे पढ़ना नहीं है, नियमित अभ्यास भी करना है
  • हमारे साथ जुड़े रहें और अपने स्वास्थ्य का लाभ लेते रहें।

आप सभी को सत-सत नमन।
खुश रहें, मस्त रहें और आनंदित रहें।

योगाचार्य ढाका राम
संस्थापक, योगापीस संस्थान

एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर : पर्वतासन

हरि ओम 🙏 आप सभी को हमारा मुस्कुराता हुआ नमस्कार।

एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर कार्यक्रम में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।

आजकल हमारे ब्लॉग सूर्य नमस्कार की श्रृंखला पर चल रहे हैं। पिछले ब्लॉग में हमने अश्व संचालन आसन के बारे में जाना था। आज हम बात करेंगे पर्वतासन (Mountain Pose) के बारे में।

शरीर की स्थिति पर्वत के समान होने के कारण इस आसन को पर्वतासन कहते हैं। यह हमारे पूरे शरीर के लिए अत्यंत लाभकारी है। जब हम इसे करते हैं, तो यह शरीर में खिंचाव लाता है, शक्ति प्रदान करता है और मन को शांत करता है।


अश्व संचालन आसन से पर्वतासन में कैसे आएं

  • अश्व संचालन आसन में हमारा दायाँ पैर पीछे रहता है।
  • पर्वतासन में आने के लिए कमर को ऊपर उठाते हुए धीरे से बायाँ पैर भी पीछे ले जाएँ।
  • बाएँ पैर की एड़ी को दाएँ पैर की एड़ी से मिलाएँ।
  • नितंबों और लोअर बैक को ऊपर की ओर खींचकर रखें।
  • सिर हमारे हाथों के बीच में रहेगा।
  • दोनों पैर सीधे रहेंगे और एड़ियाँ जमीन से लगी रहेंगी।
  • नितंब ऊपर आकाश की ओर खिंचे रहेंगे।

पर्वतासन करते समय ध्यान रखें

  • घुटने सीधे रहेंगे।
  • एड़ियों को जमीन से लगाने का प्रयास करेंगे।
  • शरीर का संतुलन बनाते हुए कम से कम 20 सेकंड इसी अवस्था में रुकने का प्रयास करें।

पर्वतासन के लाभ

  • कंधों को मजबूत बनाता है।
  • पैरों के लिए अत्यंत लाभकारी है।
  • सिर की ओर रक्त संचार बढ़ने से चेहरे पर निखार आता है।
  • दिमाग सक्रिय और दुरुस्त रहता है।
  • मेरुदंड को लचीला बनाता है।

विशेष टिप्पणी

जब हम पर्वतासन करते हैं तो चेहरा नीचे की ओर होता है। इससे रक्त का प्रवाह चेहरे की ओर बढ़ता है और त्वचा में ताजगी एवं चमक आती है।

अगले ब्लॉग की झलक

प्यारे मित्रों! अगले ब्लॉग में हम भुजंगासन के बारे में बात करेंगे। आप सब हमारे साथ इसी प्रकार जुड़े रहें और अपने स्वास्थ्य का लाभ उठाते रहें।

तो प्यारे मित्रों, आप सभी को सत-सत नमन।
आप सभी खुश रहें, मस्त रहें और आनंदित रहें।

योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक – योगापीस संस्थान

हनुमानजी जैसी छाती फुलाकर बैठने का योगिक और वैज्ञानिक रहस्य

हरि ओम्, प्यारे मित्रों!
आज हम बात करेंगे उस विशेष मुद्रा की, जिसे हम अक्सर “हनुमानजी जैसी छाती फुलाकर बैठना” कहते हैं।

हनुमानजी का स्वरूप सदैव संयम, ऊर्जा और शारीरिक व मानसिक शक्ति का प्रतीक माना गया है। उनकी छाती विशाल, स्थिर और खुली होती है – जिसे देखकर सहज ही आत्मविश्वास, शक्ति, प्राणशक्ति और धैर्य का अनुभव होता है।

योगिक दृष्टिकोण से भी ऐसे ओपन चेस्ट पोज़्चर (Open Chest Posture) का गहरा महत्व है।

छाती फुलाने का सही अर्थ

छाती फुलाने का अर्थ केवल सांस भरकर फुला लेना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है:

  • कंधों को थोड़ा पीछे खींचना
  • छाती को ऊपर और आगे उठाना
  • रीढ़ को सीधा रखना

इस मुद्रा में शरीर स्वाभाविक रूप से “ओपन” और संतुलित स्थिति में आ जाता है।

छाती फुलाने के लाभ

शारीरिक लाभ

  • फेफड़ों को अधिक स्थान → ऑक्सीजन का सेवन बढ़ता है → अंगों को अधिक ऊर्जा मिलती है।
  • हृदय पर दबाव घटता है → रक्त संचार बेहतर होता है।
  • रीढ़ सीधी रहती है → कमर-दर्द व पीठ की समस्याओं से राहत।
  • गले का क्षेत्र खुला रहता है → श्वसन तंत्र साफ रहता है।
  • पेट पर दबाव कम होता है → पाचनतंत्र में सुधार।

मानसिक व भावनात्मक लाभ

  • खुली छाती → आत्मविश्वास और मानसिक ऊर्जा में वृद्धि।
  • शक्तिशाली मुद्रा → सकारात्मक बॉडी लैंग्वेज विकसित होती है।
  • “ओपन चेस्ट” स्थिति → तनाव और अवसाद में कमी लाने में सहायक।
  • संस्कारशील भाव उत्पन्न होते हैं, जैसे:
    • “मैं पूर्ण निष्ठा से बैठा हूं।”
    • “मैं तैयार हूं।”
    • “मैं निर्भय हूं।”

योग में छाती खोलने की भूमिका

योग में छाती खोलना का तात्पर्य है:

  • अनाहत चक्र (हृदय चक्र) को सक्रिय करना।
  • यह चक्र प्रेम, करुणा, संतुलन और अपनत्व से जुड़ा होता है।

जब हम सिकुड़कर या झुककर बैठते हैं, तो केवल सांस ही अवरुद्ध नहीं होती, बल्कि मानसिक ऊर्जा भी कमजोर हो जाती है।

“हनुमानजी जैसी छाती” एक भाव

  • आत्मविश्वास के साथ बैठना।
  • श्रद्धा और समर्पण के साथ बैठना।
  • मस्तक झुका हो, पर छाती में धैर्य हो।
  • अहंकार न हो, लेकिन अपार शक्ति का भाव हो।

“हनुमानजी जैसी छाती फुलाकर बैठना” केवल शारीरिक मुद्रा नहीं है।
यह मन, प्राण और चेतना को संतुलित करने की प्रक्रिया है।
यहीं से योग की वास्तविक यात्रा प्रारंभ होती है।

आप सभी स्वस्थ, प्रसन्न और आनंदित रहें।

धन्यवाद!
योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक, योगापीस संस्थान

महामंत्र हरि ॐ

हरि ॐ का आध्यात्मिक अर्थ

हरि” का अर्थ है वह परम शक्ति जो सृष्टि का पालन करती है — भगवान विष्णु
” को प्रणव कहा गया है, जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड का मूल स्वर है।
वेद और उपनिषद इसे सर्वोच्च ध्वनि मानते हैं — सृष्टि के आरंभ और अंत दोनों में इसका अस्तित्व है।

जब “हरि ॐ” का संयुक्त उच्चारण किया जाता है, तो यह मंत्र साधक को दिव्य ऊर्जा से जोड़कर ईश्वर के साथ प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करता है।


अभ्यास की विधि

  1. बैठने की स्थिति
    • साधक को शांत मन से सुखासन में बैठना चाहिए।
    • रीढ़ को सीधा रखें, ताकि ऊर्जा का प्रवाह ऊपर की ओर सहज हो सके।
  2. “हरि” उच्चारण के समय
    • दोनों हाथों को साइड से फैलाते हुए ऊपर उठाएँ।
    • यह क्रिया ब्रह्मांडीय ऊर्जा को आमंत्रित करने का प्रतीक है।
    • इससे हृदय चक्र और आज्ञा चक्र सक्रिय होते हैं।
  3. “ॐ” उच्चारण के समय
    • होंठ मिलाने के साथ दोनों हथेलियाँ नमस्कार मुद्रा में आ जाएँ।
    • यह समर्पण और एकता का प्रतीक है।
    • इस समय सहस्रार चक्र सक्रिय होता है और दिव्य ऊर्जा अवतरित होती है।
  1. “म्” ध्वनि के साथ
    • शरीर को झुकाकर माथा भूमि पर स्पर्श कराएँ।
    • दोनों हाथ आगे खींचें, जिससे इड़ा और पिंगला नाड़ी संतुलित हों।
    • ध्यान रखें, कूल्हे ज़मीन से न उठें — अन्यथा मूलाधार चक्र का पृथ्वी से संपर्क टूट जाता है।

लाभ

  • मस्तिष्क शांत होता है, तंत्रिका तंत्र संतुलित रहता है।
  • हृदय गति सामान्य होती है, रक्तचाप नियंत्रित रहता है।
  • रीढ़ सीधी रहने से स्नायु तंत्र सक्रिय होता है।
  • मूलाधार, मणिपुर और सहस्रार चक्र जागृत होते हैं।
  • मानसिक तनाव, चिंता और डर कम होते हैं।
  • शरीर में सकारात्मक कंपन उत्पन्न होते हैं, जो आत्मा को गहराई से स्पर्श करते हैं।

आध्यात्मिक महत्त्व

“हरि ॐ” के अभ्यास से साधक धीरे-धीरे आत्मा की शुद्धता की ओर बढ़ता है।
उसकी चेतना सीमित अहं से निकलकर असीम ब्रह्मांड से जुड़ने लगती है।

  • योग में यह साधना शरीर और मन को संतुलित करती है।
  • भक्ति में यह ईश्वर से आत्मिक जुड़ाव कराती है।
  • ज्ञान में यह आत्मा को सत्य की ओर ले जाती है।

उपसंहार

हरि ॐ” केवल एक शब्द या ध्वनि नहीं, बल्कि एक गहन आध्यात्मिक और वैज्ञानिक प्रक्रिया है।
सही मुद्रा, भाव और समर्पण के साथ इसका अभ्यास शरीर, मन और आत्मा को पूर्ण रूप से जागृत करता है।

यह मंत्र साधक के भीतर छिपी दिव्यता को प्रकट करता है और ब्रह्मांड की अनंत ऊर्जा से जोड़ देता है।

आप सभी खुश रहें, मस्त रहें और आनंदित रहें।
धन्यवाद!

योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक, योगापीस संस्थान

मुस्कान के साथ स्वास्थ्य की ओर – उत्थित पद्मासन का अभ्यास

हरि ओम!
आप सभी को हमारा मुस्कुराता हुआ नमस्कार। कहते हैं – मुस्कुराहट के बिना कुछ नहीं, इसलिए आइए हमेशा मुस्कुराते रहें।
“एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर” कार्यक्रम में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।

आज का विषय: उत्थित पद्मासन (Uttit Padmasana)

‘उत्थित’ का अर्थ है – उठा हुआ, और ‘पद्मासन’ का अर्थ है – कमल की मुद्रा।
अतः उत्थित पद्मासन = उठा हुआ पद्मासन

अभ्यास विधि:

  1. पद्मासन में बैठना:
    • दंडासन में बैठ जाएं।
    • दाहिने पैर को मोड़ें और एड़ी को नाभि से सटाकर बाईं जांघ पर रखें।
    • फिर बाएं पैर को मोड़कर उसकी एड़ी को दाईं जांघ पर रखें।
  2. हाथों की स्थिति:
    • दोनों हथेलियाँ जमीन पर रखें – नितंबों के दोनों ओर।
  3. उत्थान प्रक्रिया:
    • धीरे-धीरे शरीर को ऊपर उठाएं।
    • कमर बिल्कुल सीधी रखें।
    • नितंब और घुटने जमीन के समांतर हों।
    • दोनों हाथ सीधे और कोहनियाँ बिना मुड़े रहें।
    • दृष्टि सामने रखें।
  4. स्थिति बनाए रखें:
    • 30 सेकंड से लेकर 1 मिनट तक इस अवस्था में रहें।
    • शरीर को यथासंभव ऊपर उठाने का प्रयास करें।
  5. वापस आने की प्रक्रिया:
    • धीरे-धीरे जिस क्रम में गए थे उसी तरह वापस आएं।
    • आंखें बंद करें और शरीर में आए परिवर्तन का अवलोकन करें।

लाभ (Benefits):

  • कंधे मजबूत बनते हैं।
  • मेरुदंड (spine) को बल और लचीलापन मिलता है।
  • पेट की मांसपेशियों में खिंचाव आकर पाचन तंत्र सुधरता है।

यदि पद्मासन न लगे तो क्या करें?

  • सुखासन में भी यह आसन किया जा सकता है।
  • जो पैरों को न उठा सकें, वे केवल नितंब उठाकर अभ्यास शुरू करें।
  • अभ्यास के साथ कंधों में ताकत आएगी और धीरे-धीरे पूरा आसन संभव हो जाएगा।

सावधानियाँ (Precautions):

  • गर्भवती महिलाएं यह आसन न करें।
  • जिनका हाल ही में पेट का ऑपरेशन हुआ हो, वे भी न करें।
  • जिनकी कलाई में दर्द हो, वे इस अभ्यास से बचें।

प्रिय मित्रों,
आप हमारे साथ नियमित अभ्यास करते रहें। अगर कोई आसन नहीं होता, तो अभ्यास करते रहें – धीरे-धीरे सब संभव होगा। घबराने की जरूरत नहीं है।
हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं – आप स्वस्थ, मस्त और आनंदित रहें।

आप सभी का हार्दिक आभार।

योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक – योगापीस संस्थान

सही आसन, सही जीवन: बैठने का योगिक महत्व

शरीर का वजन बैठते समय कहाँ होता है?

योग केवल आसनों या शारीरिक मुद्राओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शरीर, मन और आत्मा के संतुलन की सम्पूर्ण विद्या है। जब हम साधना के लिए किसी आसन में बैठते हैं – विशेषकर सुखासन, पद्मासन या पला‍थी जैसी स्थितियों में – तब शरीर का भार किस प्रकार से वितरित होता है, इसका गहरा प्रभाव हमारी शारीरिक व मानसिक स्थिति पर पड़ता है।

बैठने पर शरीर का भार कहाँ जाता है?

जब हम पालथी मारकर बैठते हैं, तब शरीर का सम्पूर्ण भार कूल्हों (Hip joints), टांगों की हड्डियों (Femurs), तथा श्रोणि (Pelvis) की हड्डियों के माध्यम से ज़मीन पर जाता है। यह भार मुख्य रूप से दोनों कूल्हों (Ischial tuberosities) पर होना चाहिए।

यदि शरीर का वजन किसी एक ओर (दाएँ या बाएँ कूल्हे पर) अधिक हो जाए, तो शरीर का संरेखन (Alignment) बिगड़ जाता है। लंबे समय तक ऐसा बैठने से रीढ़, पीठ, घुटनों और यहाँ तक कि गर्दन पर भी असंतुलन उत्पन्न होता है।

ठीक उसी तरह जैसे गाड़ी के टायरों में हवा असमान हो तो गाड़ी झुक जाती है और उसकी चेसिस खराब हो सकती है, वैसे ही शरीर का भार असमान हो तो कई शारीरिक समस्याएँ जन्म लेती हैं।

संभावित समस्याएँ

  • रीढ़ की हड्डी का झुकाव (Scoliosis/kyphosis)
  • घुटनों पर असमान दबाव → गठिया या कूल्हों की जकड़न
  • झुकी हुई पीठ और संकुचित छाती → फेफड़ों की कार्यक्षमता में कमी
  • असंतुलन से प्राण ऊर्जा का व्यर्थ व्यय → थकान और मानसिक तनाव

योगशास्त्र का मार्गदर्शन

स्थिरं सुखं आसनम्” – अर्थात वह आसन जिसमें स्थिरता और सुख हो।

इसीलिए बैठते समय ध्यान रखें:

  • दोनों कूल्हों को ज़मीन पर बराबरी से टिकाएँ, आवश्यकता हो तो कुशन/कंबल का सहारा लें।
  • पीठ सीधी रखें और छाती को ओपन चेस्ट स्थिति में रखें।
  • कंधों को पीछे घुमाकर ढीला छोड़ें।
  • गर्दन सीधी और ठोड़ी थोड़ी अंदर (जालंधर बंध की भाँति)

सही बैठक के लाभ

  1. मांसपेशीय तनाव में कमी – समान भार वितरण से अनावश्यक खिंचाव नहीं होता।
  2. स्नायु-तंत्र की सक्रियता – उचित मुद्रा से मानसिक एकाग्रता और भावनात्मक संतुलन बढ़ता है।
  3. श्वसन प्रणाली में सुधार – खुली छाती व सीधी पीठ से फेफड़े पूरी तरह फैलते हैं।
  4. रक्त संचार और ऊर्जा प्रवाह – सही मुद्रा से रक्त प्रवाह व चक्र सक्रिय रहते हैं।

निष्कर्ष

योग में आसन केवल बाहरी मुद्रा नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना का माध्यम हैं। जब हम अपने शरीर का भार सम रूप से वितरित करते हैं और रीढ़ की स्थिति सही रखते हैं, तो शारीरिक, मानसिक और आत्मिक संतुलन प्राप्त होता है।

जैसे मजबूत नींव वाली इमारत हर तूफान में अडिग रहती है, वैसे ही योग में सही संरेखन और भार संतुलन हमें जीवन की हर परिस्थिति में स्थिर और ऊर्जावान बनाए रखता है।

आप सभी खुश रहें, मस्त रहें और आनंदित रहें।
धन्यवाद!

योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक, योगापीस संस्थान

द्विपाद वृत्ताकार क्रिया: पेट-कमर की चर्बी पिघलाने का रामबाण उपाय

आप सभी का स्वागत है!

एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर कार्यक्रम में हमारे साथ जुड़ने के लिए धन्यवाद। आज हम द्विपाद वृत्ताकार क्रिया के बारे में चर्चा करेंगे—एक ऐसी क्रिया जो पेट और कमर पर जमी अवांछित चर्बी को प्रभावी ढंग से कम करती है।

क्रिया करने की विधि

  1. प्रारंभिक स्थिति:
  • पीठ के बल लेट जाएँ।
  • कोहनियों को ज़मीन पर टिकाकर शरीर के ऊपरी हिस्से को उठाएँ।
  • छाती को तानकर रखें।
  • कंधे और कोहनी 90° अंश पर हों तथा एक सीध में रहें।
  1. दक्षिणावृत्त (घड़ी की दिशा में):
  • दोनों पैरों को धीरे-धीरे दाईं ओर से उठाएँ।
  • बड़ा गोलाकार घुमाव बनाते हुए पैरों को clockwise घुमाएँ।
  • एक चक्र पूरा करने में 15-20 सेकंड लगाएँ।
  • थकान होने पर शवासन में विश्राम करें।
  1. वामावृत्त (घड़ी की विपरीत दिशा में):
  • अब पैरों को बाईं ओर से उठाएँ।
  • anti-clockwise दिशा में बड़ा गोला बनाएँ।
  • दक्षिणावृत्त के बराबर समय तक घुमाएँ।
  • दोनों दिशाओं में बराबर चक्र पूरे करने के बाद शवासन में आराम करें।

अवधि

  • सामान्य व्यक्ति:
    दक्षिणावृत्त + वामावृत्त के 4-6 चक्र (कुल 3 मिनट)।
  • वजन घटाने हेतु:
    प्रत्येक दिशा में 2 मिनट (कुल 4 मिनट)।

विशेष सावधानियाँ

  • कंधे और कोहनी हमेशा 90° अंश व एक सीध में रखें।
  • हथेलियाँ ज़मीन पर स्थिर टिकी हों, कोहनियाँ पास-पास रखें।
  • गर्दन पर दबाव न डालें। छाती फुलाकर रखें।
  • घुटने सीधे रहें।
  • न करें यदि:
  • गर्भावस्था या माहवारी चल रही हो।
  • सावधानी से करें:
  • गर्दन दर्द/सूजन हो तो पीठ के बल लेटकर करें।
  • पेट के अल्सर या कमर दर्द में एक पैर से अभ्यास करें।
  • क्रिया करने में जल्दबाज़ी न करें—शांत व सहज भाव से करें।

लाभ

  • पेट-कमर की चर्बी कम होती है।
  • पाचन तंत्र मजबूत होता है।
  • पेट की मांसपेशियों की प्राकृतिक मालिश।
  • नितंबों की चर्बी घटाने में सहायक।

“इस क्रिया का पूरा लाभ पाने के लिए कोहनियों के बल उठकर करें। लेटकर करने पर कमर पर तनाव पड़ता है, जिससे प्रभाव घट जाता है।”

आप सभी का हृदय से आभार। स्वस्थ रहें, मस्त रहें!
योगाचार्य ढाका राम
संस्थापक, योगापीस संस्थान