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24-Oct-2026

उत्थित त्रिकोणासन (Utthita Trikonasana): करने की सही विधि, लाभ, सावधानियाँ और सम्पूर्ण जानकारी

योगाचार्य ढाकाराम

योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि शरीर, श्वास और मन के बीच संतुलन स्थापित करने की एक प्राचीन पद्धति है। योग के विभिन्न आसनों में उत्थित त्रिकोणासन (Utthita Trikonasana) एक महत्वपूर्ण खड़े होकर किया जाने वाला आसन है। अंग्रेज़ी में इसे Extended Triangle Pose कहा जाता है।

यह आसन पैरों की मांसपेशियों को सक्रिय करने, कूल्हों और हैमस्ट्रिंग का लचीलापन बढ़ाने, शरीर का संतुलन सुधारने तथा छाती एवं कंधों को खोलने में सहायक हो सकता है।

इस आसन में दोनों पैरों को फैलाकर खड़े होते हैं और धड़ को एक ओर झुकाते हुए हाथों को विपरीत दिशाओं में फैलाते हैं। सही स्थिति में शरीर त्रिकोण जैसी आकृति बनाता है।

उत्थित त्रिकोणासन का अभ्यास करते समय सही तकनीक, सहज श्वास और शरीर की क्षमता का ध्यान रखना महत्वपूर्ण है। शुरुआती साधक योग ब्लॉक या दीवार का सहारा ले सकते हैं, जबकि अनुभवी साधक अपनी क्षमता के अनुसार आसन की अवधि, स्थिरता और संरेखण में सुधार कर सकते हैं।

1. उत्थित त्रिकोणासन क्या है?

उत्थित त्रिकोणासन एक खड़े होकर किया जाने वाला योगासन है, जिसमें पैरों को फैलाकर शरीर को एक ओर झुकाया जाता है। एक हाथ नीचे की ओर और दूसरा हाथ ऊपर की ओर फैलाया जाता है।

इस आसन में शरीर के दोनों पार्श्व भागों, पैरों, कूल्हों, रीढ़ और कंधों पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

इसका उद्देश्य केवल शरीर को झुकाना नहीं, बल्कि स्थिरता, विस्तार, संतुलन और सहज श्वास के साथ पूरे शरीर में सामंजस्य स्थापित करना है।

2. उत्थित त्रिकोणासन का अर्थ और उत्पत्ति

उत्थित त्रिकोणासन संस्कृत के तीन शब्दों से मिलकर बना है:

  • उत्थित (Utthita): विस्तारित, फैला हुआ या उठाया हुआ।
  • त्रिकोण (Trikona): तीन कोणों वाली आकृति अर्थात त्रिकोण।
  • आसन (Asana): शारीरिक मुद्रा या स्थिति।

इन शब्दों का संयुक्त अर्थ है विस्तारित त्रिकोण की मुद्रा।

आधुनिक योगाभ्यास में इस आसन को लचीलापन, स्थिरता, संतुलन और शारीरिक संरेखण (Alignment) विकसित करने के लिए शामिल किया जाता है।

3. उत्थित त्रिकोणासन करने की सही विधि

इस आसन का अभ्यास क्रमबद्ध तरीके से करना चाहिए। प्रत्येक चरण में शरीर की स्थिति, श्वास और सहजता का ध्यान रखें।

चरण 1: सम स्थिति में खड़े हों

  • दोनों पैरों को मिलाकर सम स्थिति में खड़े हो जाएँ।
  • रीढ़ को सहज रूप से सीधा रखें।
  • कंधों को ढीला और शरीर को तनावमुक्त रखें।
  • सामान्य गति से श्वास लेते रहें।

चरण 2: पैरों को उचित दूरी पर फैलाएँ

  • श्वास लेते हुए दोनों पैरों को लगभग 3 से 3½ फीट की दूरी पर फैलाएँ।
  • शुरुआती साधक सहज श्वास के साथ यह स्थिति बना सकते हैं।
  • दाहिने पैर को लगभग 90 डिग्री बाहर की ओर घुमाएँ।
  • बाएँ पैर के पंजे को लगभग 60 डिग्री अंदर की ओर रखें।
  • दोनों पैरों को स्थिर और सक्रिय रखें।
  • घुटनों पर अनावश्यक दबाव न डालें।

चरण 3: हाथों को फैलाएँ और पार्श्व भाग में खिंचाव लाएँ

  • दोनों हाथों को धीरे-धीरे कंधों की ऊँचाई तक बगल में फैलाएँ।
  • हथेलियों को नीचे की ओर रखें।
  • दोनों हाथों को विपरीत दिशाओं में अच्छी तरह फैलाएँ।
  • अब दाहिने हाथ को धीरे-धीरे सिर के ऊपर ले जाएँ।
  • दाहिने हाथ को ऊपर की ओर लंबा करते हुए शरीर के दाहिने पार्श्व भाग में खिंचाव महसूस करें।
  • विशेष रूप से दाहिनी पसलियों, बगल और कंधे के आसपास विस्तार का अनुभव करें।

चरण 4: धड़ को दाहिनी ओर झुकाएँ

  • श्वास भरते हुए दाहिने हाथ को ऊपर की ओर लंबा करें।
  • श्वास छोड़ते हुए उसी विस्तार को बनाए रखकर धीरे-धीरे दाहिनी ओर झुकें।
  • झुकाव कूल्हे के जोड़ से होना चाहिए।
  • धड़ को आगे या पीछे की ओर गिराने के बजाय पार्श्व दिशा में लंबा रखें।
  • छाती को खुला और रीढ़ को लंबा बनाए रखें।
  • श्वास लेते हुए मेरुदंड के विस्तार का अनुभव करें।
  • श्वास छोड़ते हुए छाती को सहज रूप से ऊपर की दिशा में खोलने का प्रयास करें।

चरण 5: हाथों की सही स्थिति बनाएँ

  • दाहिने हाथ को दाहिनी पिंडली या टखने के पास रखें।
  • आवश्यकता होने पर योग ब्लॉक या कम ऊँचाई वाले मजबूत स्टूल का सहारा लें।
  • हाथ को जमीन तक पहुँचाने के लिए शरीर का संतुलन या सही संरेखण न बिगाड़ें।
  • बाएँ हाथ को ऊपर की ओर फैलाएँ।
  • दोनों हाथों को लगभग एक सीध में रखते हुए विपरीत दिशाओं में विस्तार बनाए रखें।

चरण 6: सिर, गर्दन और दृष्टि की स्थिति

  • गर्दन को अपनी सुविधा और शारीरिक क्षमता के अनुसार घुमाएँ।
  • यदि सहज लगे तो ऊपर उठे हुए हाथ की ओर दृष्टि रखें।
  • गर्दन में दर्द, सर्वाइकल संबंधी समस्या या असुविधा होने पर सामने अथवा नीचे की ओर देखें।
  • गर्दन पर अनावश्यक दबाव न डालें।

चरण 7: सहज श्वास के साथ आसन में रुकें

  • आसन की स्थिति बनने के बाद सामान्य श्वास लेते रहें।
  • अपनी क्षमता के अनुसार लगभग 45 सेकंड से 1 मिनट तक रुकने का प्रयास करें।
  • शुरुआती साधक कम अवधि से शुरुआत कर सकते हैं।
  • आसन में स्थिर रहते हुए पैरों, रीढ़, पसलियों और कंधों में होने वाले खिंचाव को महसूस करें।
  • साँस रोकने या शरीर पर अनावश्यक दबाव डालने से बचें।

चरण 8: प्रारम्भिक स्थिति में वापस आएँ

  • श्वास लेते हुए धीरे-धीरे धड़ को ऊपर उठाएँ।
  • दाहिने हाथ को सिर के ऊपर से वापस कंधों की सीध में लाएँ।
  • दोनों हाथों को कुछ क्षण विपरीत दिशाओं में फैलाकर रखें।
  • फिर हाथों को धीरे-धीरे नीचे लाएँ।
  • पैरों को वापस सम स्थिति में ले आएँ।
  • लगभग 15 से 20 सेकंड तक आराम करें।

इस विश्राम के दौरान अपने पैरों, श्वास और मन की स्थिति का अवलोकन करें। दोनों पैरों में होने वाले अनुभवों के अंतर को महसूस करें। दाहिने पैर में हल्कापन या शरीर में शांति का अनुभव हो सकता है।

शरीर और मन को सहज करने के बाद यही अभ्यास दूसरी ओर दोहराएँ। अंत में पुनः कुछ क्षण रुककर तन, मन और श्वास का अवलोकन करें।

महत्वपूर्ण: अभ्यास के दौरान दर्द, चक्कर या असामान्य असुविधा महसूस होने पर आसन से धीरे-धीरे बाहर आ जाएँ।

4. उत्थित त्रिकोणासन के प्रमुख लाभ

4.1 पैरों और टखनों को मजबूत बनाने में सहायक

उत्थित त्रिकोणासन में पैरों को स्थिर रखते हुए शरीर का संतुलन बनाए रखना होता है। इससे जाँघों, पिंडलियों और टखनों के आसपास की मांसपेशियाँ सक्रिय होती हैं।

नियमित अभ्यास पैरों की स्थिरता और मांसपेशियों की कार्यक्षमता को बेहतर बनाने में सहायक हो सकता है।

4.2 हैमस्ट्रिंग और कूल्हों का लचीलापन बढ़ाने में सहायक

इस आसन में जाँघों के पिछले हिस्से की मांसपेशियों, जिन्हें हैमस्ट्रिंग कहा जाता है, तथा कूल्हों के आसपास खिंचाव महसूस होता है।

सही तकनीक और नियमित अभ्यास से इन भागों के लचीलेपन में सुधार हो सकता है।

4.3 शरीर का संतुलन सुधारने में सहायक

इस आसन में पैरों को जमीन पर स्थिर रखते हुए धड़ और हाथों की स्थिति को नियंत्रित करना पड़ता है।

इससे शरीर के प्रति जागरूकता, स्थिरता और संतुलन बनाए रखने की क्षमता विकसित करने में सहायता मिल सकती है।

4.4 छाती और कंधों को खोलने में मदद

दोनों हाथों को विपरीत दिशाओं में फैलाने और छाती को खुला रखने से कंधों, पसलियों तथा ऊपरी धड़ में खिंचाव होता है।

इससे छाती की गतिशीलता बढ़ सकती है और सहज, विस्तृत श्वास लेने के प्रति जागरूकता विकसित हो सकती है।

4.5 शारीरिक मुद्रा सुधारने में सहायक

उत्थित त्रिकोणासन में रीढ़ को लंबा रखने, छाती को खुला रखने और कंधों को व्यवस्थित रखने का अभ्यास किया जाता है।

इससे शरीर के सही संरेखण और मुद्रा के प्रति जागरूकता बढ़ सकती है।

4.6 श्वास और एकाग्रता में सहायक

आसन के दौरान सामान्य एवं नियंत्रित श्वास बनाए रखने से साधक शरीर की स्थिति और श्वास के प्रति अधिक सजग हो सकता है।

यह अभ्यास मन को वर्तमान क्षण में केंद्रित करने में भी सहायक हो सकता है।

समग्र लाभ: उत्थित त्रिकोणासन एड़ियों, पिंडलियों, घुटनों के आसपास की सहायक मांसपेशियों, जाँघों, कूल्हों, मेरुदंड और कंधों की सक्रियता, स्थिरता एवं लचीलेपन को बेहतर बनाने में उपयोगी हो सकता है।

5. उत्थित त्रिकोणासन में सक्रिय होने वाली मांसपेशियाँ

उत्थित त्रिकोणासन में शरीर के अनेक हिस्सों की मांसपेशियाँ सक्रिय होती हैं।

  • हैमस्ट्रिंग (Hamstrings): जाँघों के पिछले हिस्से की मांसपेशियाँ, जिनमें खिंचाव महसूस हो सकता है।
  • तिरछी पेट की मांसपेशियाँ (Obliques): धड़ को स्थिर रखने और उसकी स्थिति नियंत्रित करने में सहायता करती हैं।
  • ग्लूटियल मांसपेशियाँ (Gluteal Muscles): कूल्हों की स्थिरता बनाए रखने में योगदान देती हैं।
  • जाँघों की मांसपेशियाँ: पैरों को स्थिर रखने और घुटनों की स्थिति नियंत्रित करने में सहायक होती हैं।
  • पिंडलियों एवं टखनों की मांसपेशियाँ: शरीर का संतुलन बनाए रखने में भूमिका निभाती हैं।
  • कंधों एवं ऊपरी पीठ की मांसपेशियाँ: हाथों को फैलाकर रखने और छाती की स्थिति बनाए रखने में सहायता करती हैं।

इन मांसपेशियों पर पड़ने वाला प्रभाव व्यक्ति की शारीरिक संरचना, लचीलेपन, आसन की स्थिति और अभ्यास के तरीके के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।

6. उत्थित त्रिकोणासन करते समय होने वाली सामान्य गलतियाँ

6.1 आगे या पीछे की ओर झुक जाना

यह आसन मुख्य रूप से बगल की ओर झुकने और शरीर को पार्श्व दिशा में लंबा करने का अभ्यास है।

आगे या पीछे की ओर अत्यधिक झुकने से छाती और रीढ़ का सही संरेखण बिगड़ सकता है।

सुधार: धड़ को बगल की ओर लंबा रखें और आवश्यकता पड़ने पर योग ब्लॉक या मजबूत सहारे का उपयोग करें।

6.2 घुटनों पर अत्यधिक दबाव डालना

घुटनों को जरूरत से ज्यादा सीधा खींचना या पीछे की ओर लॉक करना असुविधा उत्पन्न कर सकता है।

जिन लोगों के घुटनों में हाइपरएक्सटेंशन की समस्या है, उन्हें विशेष सावधानी रखनी चाहिए।

सुधार: घुटनों को स्थिर और नियंत्रित रखें। आवश्यकतानुसार हल्का मोड़ बनाए रखें और प्रशिक्षित योग विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में सहारे का उपयोग करें।

6.3 गर्दन पर अनावश्यक तनाव डालना

संतुलन बनाए रखने या ऊपर देखने के प्रयास में गर्दन को जबरदस्ती घुमाना असुविधाजनक हो सकता है।

सुधार: गर्दन को सहज रखें। आवश्यकता होने पर सामने या नीचे की ओर देखें।

6.4 जमीन तक हाथ पहुँचाने की जल्दबाजी करना

हर व्यक्ति के शरीर का लचीलापन अलग होता है। हाथ को जमीन तक पहुँचाने के लिए धड़ को गलत दिशा में मोड़ना उचित नहीं है।

सुधार: हाथ को पिंडली, टखने या योग ब्लॉक पर रखें। सही संरेखण को प्राथमिकता दें।

6.5 अभ्यास के दौरान साँस रोकना

आसन को अधिक समय तक बनाए रखने के लिए साँस रोकना आवश्यक नहीं है।

सुधार: पूरे अभ्यास के दौरान सामान्य और सहज श्वास लेते रहें।

7. उत्थित त्रिकोणासन में आवश्यक सावधानियाँ

इस आसन का अभ्यास करते समय अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य स्थिति का ध्यान रखना आवश्यक है।

  • पीठ, गर्दन या घुटनों में चोट होने पर अभ्यास से पहले चिकित्सक या प्रशिक्षित योग विशेषज्ञ से परामर्श लें।
  • संतुलन बनाने में कठिनाई होने पर दीवार या योग ब्लॉक का सहारा लें।
  • गर्दन में परेशानी होने पर ऊपर देखने के बजाय सिर को सहज स्थिति में रखें।
  • गर्भावस्था के दौरान इस आसन का अभ्यास करने से पहले चिकित्सक और गर्भावस्था योग में प्रशिक्षित विशेषज्ञ से सलाह लें।
  • उच्च रक्तचाप या अन्य चिकित्सकीय समस्या होने पर अपनी स्थिति के अनुसार विशेषज्ञ से मार्गदर्शन प्राप्त करें।
  • दर्द, चक्कर या असामान्य खिंचाव महसूस होने पर तुरंत अभ्यास रोक दें।
  • शुरुआत में अधिक देर तक आसन बनाए रखने के बजाय सही तकनीक, संतुलन और सहज श्वास पर ध्यान दें।

योगाभ्यास में शरीर की क्षमता का सम्मान करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

8. शुरुआती साधकों के लिए उपयोगी सुझाव

यदि आप योगाभ्यास की शुरुआत कर रहे हैं, तो निम्नलिखित उपाय उत्थित त्रिकोणासन को अधिक सहज बना सकते हैं।

योग ब्लॉक का उपयोग करें

हाथ को जमीन पर रखने के बजाय योग ब्लॉक या कम ऊँचाई वाले मजबूत स्टूल का सहारा लें। इससे धड़ को लंबा बनाए रखना आसान हो सकता है।

दीवार का सहारा लें

यदि संतुलन बनाने में कठिनाई हो, तो दीवार के पास अभ्यास करें।

पैरों के बीच उचित दूरी रखें

शुरुआत में पैरों को अत्यधिक फैलाने के बजाय ऐसी दूरी रखें, जिसमें शरीर स्थिर रह सके।

कम समय से शुरुआत करें

प्रत्येक ओर 15 से 30 सेकंड तक आसन बनाए रखने से शुरुआत करें। सहजता और अनुभव बढ़ने पर धीरे-धीरे अवधि बढ़ाएँ।

पहले ताड़ासन का अभ्यास करें

उत्थित त्रिकोणासन से पहले ताड़ासन और हल्के वार्म-अप अभ्यास करें। इससे शरीर की सक्रियता, जोड़ों की सहज गतिशीलता और मुद्रा के प्रति जागरूकता बढ़ सकती है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि योग में शरीर को जबरदस्ती किसी स्थिति में लाने के बजाय धीरे-धीरे क्षमता विकसित करना चाहिए।

9. उत्थित त्रिकोणासन की प्रमुख विविधताएँ

अभ्यास के स्तर और शारीरिक सुविधा के अनुसार इस आसन में कुछ बदलाव किए जा सकते हैं।

9.1 सहारे के साथ त्रिकोणासन (Supported Triangle Pose)

इसमें नीचे वाले हाथ को योग ब्लॉक या दीवार के सहारे रखा जाता है।

यह शुरुआती साधकों और सीमित लचीलेपन वाले व्यक्तियों के लिए उपयोगी विकल्प हो सकता है।

9.2 दृष्टि में बदलाव (Gaze Variations)

इस आसन में गर्दन की सुविधा के अनुसार नीचे, सामने या ऊपर की ओर देखा जा सकता है।

गर्दन में असुविधा होने पर सामने या नीचे की ओर सहज दृष्टि रखना बेहतर हो सकता है।

9.3 पैरों की दूरी में बदलाव

शुरुआती साधक अपने पैरों के बीच ऐसी दूरी रख सकते हैं, जिसमें संतुलन बना रहे और धड़ को आराम से बगल की ओर ले जाया जा सके।

10. उत्थित त्रिकोणासन करने का सही समय और अवधि

उत्थित त्रिकोणासन को नियमित योगाभ्यास में ताड़ासन और प्रारम्भिक वार्म-अप के बाद शामिल किया जा सकता है।

शुरुआती साधक प्रत्येक ओर लगभग 15 से 30 सेकंड तक अभ्यास कर सकते हैं।

अनुभव, स्थिरता और सहजता बढ़ने के साथ इस अवधि को धीरे-धीरे 45 सेकंड से 1 मिनट तक बढ़ाया जा सकता है।

अभ्यास की अवधि निर्धारित करते समय निम्न बातों को प्राथमिकता दें:

  • शरीर की क्षमता और लचीलापन।
  • पैरों एवं धड़ की स्थिरता।
  • श्वास की सहजता।
  • गर्दन, घुटनों और पीठ पर अनावश्यक दबाव का अभाव।
  • अभ्यास के दौरान मानसिक एकाग्रता।

योग का उद्देश्य अधिक समय तक आसन में बने रहने की प्रतियोगिता नहीं, बल्कि सही तकनीक, निरंतर अभ्यास और शरीर-मन के बीच बेहतर सामंजस्य विकसित करना है।

11. उत्थित त्रिकोणासन से संबंधित अन्य योगासन

समग्र योगाभ्यास के लिए निम्नलिखित आसनों को भी शामिल किया जा सकता है।

  • त्रिकोणासन (Trikonasana): त्रिकोण मुद्रा का सामान्य नाम, जिसका प्रयोग विभिन्न योग परंपराओं में अलग-अलग संदर्भों में किया जाता है।
  • वीरभद्रासन द्वितीय (Virabhadrasana II): पैरों की स्थिरता, सहनशक्ति और संतुलन विकसित करने में उपयोगी।
  • पार्श्वकोणासन (Parsvakonasana): पैरों की सक्रियता और शरीर के पार्श्व भाग में खिंचाव के अभ्यास के लिए उपयोगी।

12. उत्थित त्रिकोणासन से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: उत्थित त्रिकोणासन के मुख्य लाभ क्या हैं?

यह आसन पैरों की मांसपेशियों को सक्रिय करने, हैमस्ट्रिंग और कूल्हों का लचीलापन बढ़ाने, संतुलन सुधारने तथा छाती और कंधों को खोलने में सहायक हो सकता है।

प्रश्न 2: उत्थित त्रिकोणासन कितनी देर तक करना चाहिए?

शुरुआती साधक प्रत्येक ओर 15 से 30 सेकंड तक अभ्यास कर सकते हैं। अनुभव बढ़ने पर धीरे-धीरे 45 सेकंड से 1 मिनट तक अवधि बढ़ाई जा सकती है।

सही मुद्रा और सहज श्वास बनाए रखना अधिक महत्वपूर्ण है।

प्रश्न 3: क्या शुरुआती लोग उत्थित त्रिकोणासन कर सकते हैं?

हाँ। कई शुरुआती साधक उचित मार्गदर्शन और आवश्यकता के अनुसार योग ब्लॉक या दीवार के सहारे इस आसन का अभ्यास कर सकते हैं।

प्रश्न 4: क्या उत्थित त्रिकोणासन लचीलापन बढ़ाने में मदद करता है?

नियमित और सही अभ्यास से हैमस्ट्रिंग, कूल्हों तथा शरीर के पार्श्व हिस्सों के लचीलेपन में सुधार हो सकता है।

परिणाम व्यक्ति की शारीरिक स्थिति और अभ्यास की नियमितता पर निर्भर करते हैं।

प्रश्न 5: क्या उत्थित त्रिकोणासन से वजन कम होता है?

केवल इस आसन से वजन कम होने की गारंटी नहीं है।

स्वस्थ वजन प्रबंधन के लिए संतुलित आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद और स्वस्थ जीवनशैली महत्वपूर्ण हैं।

प्रश्न 6: क्या गर्दन की समस्या होने पर यह आसन किया जा सकता है?

गर्दन की समस्या होने पर ऊपर देखने से बचना पड़ सकता है। गर्दन को सहज स्थिति में रखते हुए सामने या नीचे देखा जा सकता है।

प्रश्न 7: उत्थित त्रिकोणासन करते समय साँस कैसे लें?

आसन में प्रवेश करते समय सहज श्वास लें। स्थिति बनाते समय सामान्य रूप से साँस लेते रहें और वापस आते समय नियंत्रित श्वास बनाए रखें।

साँस को जबरदस्ती रोकने की आवश्यकता नहीं है।

निष्कर्ष

उत्थित त्रिकोणासन एक महत्वपूर्ण योगासन है, जो शरीर की स्थिरता, लचीलेपन, संतुलन और शारीरिक जागरूकता को बेहतर बनाने में सहायक हो सकता है।

इसके नियमित अभ्यास से पैरों, कूल्हों, रीढ़, छाती और कंधों की सक्रियता एवं गतिशीलता में सुधार करने में सहायता मिल सकती है।

इस आसन की विशेषता केवल शरीर में त्रिकोण जैसी आकृति बनाना नहीं, बल्कि प्रत्येक स्थिति में विस्तार, संतुलन, सहज श्वास और सजगता का अनुभव करना है।

योग का उद्देश्य केवल कठिन आसन करना नहीं, बल्कि शरीर, मन और श्वास के बीच बेहतर तालमेल विकसित करना है।

उत्थित त्रिकोणासन को अपनी नियमित योग दिनचर्या में उचित मार्गदर्शन के साथ शामिल करके शारीरिक सक्रियता, मानसिक शांति और आत्म-जागरूकता की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।

योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक, योगापीस संस्थान

Yogacharya Dhakaram
Yogacharya Dhakaram, a beacon of yogic wisdom and well-being, invites you to explore the transformative power of yoga, nurturing body, mind, and spirit. His compassionate approach and holistic teachings guide you on a journey towards health and inner peace.