अर्ध मत्स्येन्द्र आसन: मेरुदंड की लचीलापन और पाचन के लिए श्रेष्ठ योगासन

आप सभी को हमारा मुस्कुराता हुआ नमस्कार। “एक कदम स्वास्थ्य से आनंद की ओर” कार्यक्रम में आप सभी का हार्दिक स्वागत है। आज हम अर्ध मत्स्येन्द्र आसन के अभ्यास, विधि, सावधानियों और लाभों पर विस्तार से चर्चा करेंगे। पिछली बार हमने वक्रासन के बारे में जाना था—अर्ध मत्स्येन्द्र आसन, वक्रासन से थोड़ा आगे का प्रभावी आसन है। यह आसन मत्स्येन्द्र नाथ ऋषि के नाम को समर्पित है।
अर्ध मत्स्येन्द्र आसन करने की विधि (Step-by-Step)
- सबसे पहले दंडासन में बैठ जाएँ।
- बाएँ पैर को मोड़ते हुए उसकी एड़ी दाएँ नितंब के पास रखें।
- दाएँ पैर को मोड़कर उसकी एड़ी बाएँ घुटने के पास रखें।
- शरीर को पीछे की ओर मरोड़ते हुए ले जाएँ।
- बायाँ हाथ उठाकर दाएँ पैर की जांघ के ऊपर से दाएँ पैर के पंजे को पकड़ने का प्रयास करें।
- दायाँ हाथ कमर के पीछे भूमि पर टिकाएँ।
- कंधे एक सीध में रखें और जितना संभव हो, शरीर को मरोड़ें।
- कम से कम 1 मिनट इसी स्थिति में रहें।
- उसी क्रम में धीरे-धीरे वापस आएँ।
- आँखें बंद कर आसन से पहले और बाद के अंतर का अवलोकन करें।
- 20 सेकंड विश्राम के बाद यही प्रक्रिया दूसरी ओर से दोहराएँ।




दूसरी ओर अभ्यास:
दंडासन में बैठकर दाएँ पैर की एड़ी बाएँ नितंब के पास रखें, बाएँ पैर की एड़ी दाएँ घुटने के पास रखें। शरीर को मरोड़ते हुए दाएँ हाथ से बाएँ पैर के पंजे को पकड़ें, बायाँ हाथ कमर के पीछे रखें। श्वास बाहर निकालते हुए मरोड़ बढ़ाएँ। 1 मिनट बाद धीरे से वापस आएँ और परिवर्तन का अवलोकन करें।
सावधानियाँ
- दोनों कंधे एक सीध में रहें।
- मरोड़ते समय कमर सीधी रखें।
- दोनों नितंबों पर समान भार हो।
- यदि पंजा हाथ से न पकड़े, तो कोहनी से घुटने को और घुटने से कोहनी को हल्का दबाव दें।
- जो घुटना मोड़कर खड़ा है, वह 90 डिग्री पर रहे।
- हर्निया और अल्सर में यह आसन न करें।
- मासिक धर्म के समय तथा गर्भावस्था में भी यह आसन वर्जित है।
लाभ
- मधुमेह के लिए अत्यंत लाभकारी।
- उदर के सभी अंगों की मालिश होती है।
- मेरुदंड अधिक लचीला बनता है।





सहायक साधन (Props) का उपयोग
जिन्हें ज़मीन पर बैठने में कठिनाई हो, वे लकड़ी के पाटा का उपयोग करें। इससे कूल्हे थोड़े ऊँचे रहते हैं, पेट और जांघ के बीच जगह बनती है और मरोड़ सहजता से हो पाता है।
समापन
इसी के साथ आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद और आभार। आप सभी मस्त रहें, आनंदित रहें।
— योगाचार्य ढाकाराम
संस्थापक, योगापीस संस्थान









